पत्रकारिता के ‘मसीहानंद’ और उग्र ‘हिंदू’ भीड़ की स्क्रिप्ट !!

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दृश्य 1: बाबा मसीहानंद अपने आसन पर बैठा है। लड़की ठीक उसके सामने घबराई सकुचाई बैठी है। मसीहानंद ने लड़की को कहना शुरु किया है कि घबराने की ज़रुरत नहीं है, ऊपरवाला सब देखता है और अच्छे लोगों के साथ बुरा नहीं होता। लेकिन चौथी ही लाइन में मसीहानंद लड़की को डराने लगता है कि दुनिया में कैसे जिस्म के भूखे भेड़िए घूम रहे हैं.. हर तरफ़ लड़कियों का बलात्कार हो रहा है.. उसकी आबरु भी खतरे में है। और फिर वो लड़की को कमरे में ले जाता है। लड़की को अपनी आगोश में ले लेता है। लड़की घबरा जाती है, पूछती है कि ये तो गलत है। बाबा मसीहानंद बताता है कि गलत तो वो है जो बाहर हो रहा है, यहां तो वो उसकी आगोश में सुरक्षित है.. वो तो उसका भला चाहता है। जो वो कह रहा है वही सत्य है और लड़की को खुद को उसे समर्पित कर देना चाहिए।

दृश्य 2: पत्रकारिता के मसीहानंद अपनी कुर्सी पर बैठ चुके हैं। दर्शक टीवी के सामने घबराया सकुचाया बैठा है। पत्रकारिता के मसीहानंद ने दर्शकों को बताना शुरु किया है कि कैसे हिंदू-मुसलमान को लड़ाने की साज़िश हो रही है जबकि समाज एक है और कोई किसी का बुरा नहीं चाहता। लेकिन चौथी ही लाइन में मसीहानंद दर्शकों को डराने लगता है कि देश में कैसे एक भीड़ पैदा हो गई है। कैसे हिंदुओं की ये भीड़ आतुर बैठी है हमला करने को। कोई है जो आपके लड़के को उस हिंदू भीड़ का हिस्सा बना रहा है। दर्शक घबरा जाता है। लेकिन वो मन में सोचता है कि उसका सामना तो ऐसी भीड़ ने नहीं हुआ अभी तक। पर मसीहानंद उसे समझाता है कि देश का सच वही है जो पत्रकारिता का मसीहानंद समझा रहा है। वो दर्शकों का भला चाहता है और इसी लिए हिंदू भीड़ और उसके आतंक से आगाह कर रहा है। जो वो कह रहा है वही सत्य है और दर्शक को खुद को उसे समर्पित कर देना चाहिए।
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सवाल– पत्रकारिता के मसीहानंद एक तरफ तो हिंदू-मुसलमान को भाई बताते हैं, समान बताते हैं लेकिन दूसरी तरफ भीड़ को हिंदू-मुसलमान में क्यों बांटते हैं? इस उग्र हिंदू भीड़ की ज़मीन क्यों तैयार कर रहे हैं? उसका डर क्यों पैदा कर रहे हैं?

जवाब– सब जानते हैं कि भीड़ भीड़ होती है। चाहे वो श्रीनगर में मस्जिद के बाहर एक पुलिस अफसर को पीट पीटकर मार देनेवाली भीड़ हो या फिर यूपी में अखलाक की जान ले लेने वाली भीड़। लेकिन क्यों कुछ लोग श्रीनगर वाली भीड़ को सिर्फ हिंसक भीड़ और यूपी वाली भीड़ को उग्र हिंदू भीड़ के बीच बांट देते हैं? 85 करोड़ हिन्दुओं की आबादी वाले मुल्क में 100-50 या कुछ हजार लोग पूरे हिन्दू समाज का चेहरा कैसे हो सकते हैं? प्रतिशत निकालिएगा तो .001% भी नहीं होंगे लेकिन बीते कुछ साल से एक उग्र हिंदू भीड़ आपके आसपास हमले के लिए तैयार बैठी है कि स्क्रिप्ट इसलिए लिखी जा रही है ताकि समाज बंट सके। बंट सके उस अनदेखे डर के नाम पर जिसको जानबूझकर बार बार दिखाने की कोशिश की जा रही है। मुसलमान को ये लगे कि उसके लिए मौजूदा सरकार खतरा है, अगर यही सरकार लौटी तो ये उग्र हिंदू भीड़ इतनी बड़ी हो जाएगी कि उसका रहना मुश्किल हो जाएगा और यही वो डर है जो मुस्लिम वोट बैंक को सरकार के खिलाफ़ एक जुट कर सकता है। इतना ही नहीं, हिंदूओं का बड़ा लिबरल वर्ग भी इस डर से भर सकता है कि वाकई उनका बच्चा उग्र भीड़ का हिस्सा न बन जाए और हिन्दुओं का वो वोट भी मौजूदा सरकार के पक्ष में जाने से रुक जाए। ऐसे में इस पूरे डर को पैदा करने की वजह हिंदू मुसलमान को आमने सामने खड़ा कर देना है ताकि 2019 में सियासी समीकरण पलट सके और इन मसीहानंदों के राजनीतिक आकाओं को फायदा पहुंच सके।

सवाल– तो क्या ये सच नहीं कि 2014 के बाद से ही हिन्दू-मुसलमान के बीच टकराव बढ़ गया है?

जवाब– नहीं। इस मुल्क में हिन्दू-मुसलमान हमेशा से मिलकर रहने के बावजूद गाहे बगाहे टकराते भी रहे हैं। बीते 50 सालों में (1967-2017) इस देश ने 58 बहुत बड़े दंगे देखे हैं जिनमें 12,828 लोगों की जान गई है। इतना ही नहीं, बीते 50 सालों में 17 ऐसे दंगे जिनमें 100 से ज्यादा लोगों की जानें गई हो उनमें से 9 कांग्रेस और उसके गठबंधन शासित राज्यों में हुए, 4 दूसरी पार्टियों के राज में और 1 बीजेपी के राज में हुआ। कहने का मतलब ये कि इस देश में दंगों का भी इतिहास रहा है और दूसरी पार्टियों के राज में भी दंगे होने का इतिहास रहा है लेकिन आपको बीते कुछ वक्त से बार बार यही समझाया जाता रहा है कि देश में आजादी के बाद से अमन-चैन था और सारी हिंसा और टकराव साल 2014 के बाद से शुरु हुआ।

सवाल– क्या इस देश में मुसलमानों पर अत्याचार नहीं हुए?

जवाब– बिलकुल हुए। कांग्रेस के नेता सलमान खुर्शीद ने भी माना है कि कांग्रेस के दामन पर मुसलमानों के खून के धब्बे हैं। यानि अत्याचार हुए होंगे तभी तो खून के धब्बे लगे होंगे, चाहे जिस पार्टी पर लगें। लेकिन सच ये भी है कि इस देश में अत्याचार ‘सिर्फ’ मुसलमानों पर हो रहे हों ऐसा ही नहीं है। कश्मीरी पंडितों पर अत्याचार का भी खौफनाक इतिहास है। इतना ही नहीं आजादी के पहले चले जाइए तो बाबा साहब अम्बेडकर अपनी किताब (थॉट्स ऑन पाकिस्तान) में लिख चुके हैं कि कैसे 1920 में विद्रोह तो अंग्रेज़ों के खिलाफ था लेकिन हिन्दू महिलाओं का भी बलात्कार हुआ था.. 1924 में कोहाट में दंगे हुए तो 155 लोग मारे गए और हिंदुओं को शहर छोड़ना पड़ा था। यानि हिन्दू बहुसंख्यक भले हो लेकिन उसे भी अत्याचार सहने पड़े हैं। 1984 में सिखों ने जो सहा वो कौन नहीं जानता। दलित आज भी अत्याचार सह रहे हैं। यानि अत्याचार किसी एक के हिस्से ही नहीं आया इस मुल्क में और जो आपको ऐसा बताकर बरगला रहे हैं दरअसल वो भी आप पर अत्याचार कर रहे हैं क्योंकि उन्हें आपसे नहीं आपके वोट भर से मतलब है।

सवाल– क्या करना चाहिए फिर?

जवाब– पत्रकारिता के मसीहानंदों को पहचानिए। मनोविज्ञान में कहा गया है कि जिस चीज़ के लिए मना किया जाए इंसान सबसे ज्यादा वही करना चाहता है.. वैसे ही जब आपको हिंदू-मुसलमान के खेल से बचने के लिए बोलकर किसी उग्र हिंदू भीड़ से मिलवाया जा रहा होता है तो उस खेल से बचिए। ऐसे लोग न हिंदू के हैं, न मुसलमान के। रेप को हिंदू मुसलमान बनाते हैं तो देखिए क्या होता है… कोई रेप में ‘देवी-स्थान’ को ज्यादा अहमियत देने लगता है तो कोई मदरसे में हुए रेप को मुद्दा बनाने लगता है जबकि मुद्दा तो उस पीड़िता का दर्द होना चाहिए था। रेप कमरे में हो, देवी स्थान में या मदरसे में… रेप, रेप होता है। लेकिन कैसे आपको हिंदू मुसलमान के लिए तैयार कर दिया जाता है उसे समझिए। आज रेप पर हो रहा है कल किसी और मुद्दे पर होगा। बाहर निकलिए और देखिए, कैसे एक ही ऑफिस में हिंदू भी काम कर रहा है और मुसलमान भी। मिलकर रहिएगा तो ऐसे लोगों से बच पाइएगा। चंद मुसलमान आतंकी हर मुसलमान को आतंकी नही बना सकते तो चंद हिंदुओं का कुकृत्य हर हिंदू को मुसलमान के खिलाफ नहीं दिखा/बता सकता। सोचिएगा।

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