पद्मावती होतीं तो करणी सेना से ये सवाल ज़रुर पूछतीं!

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– 18 से 44 साल की लड़कियों/महिलाओं से सबसे ज्यादा रेप इस राज्य में होते हैं।
– यहां हर रोज़ औसतन 10 रेप की वारदातें होती हैं।
– इस राज्य में हर दूसरी महिला अनपढ़ है।
– 20 से 24 साल की लड़कियों में हर तीसरी लड़की की शादी 18 साल से कम उम्र में हुई है इस राज्य में।
– इस राज्य में 15-19 साल की लड़कियों में करीब हर 16वीं लड़की या तो मां बन चुकी है या गर्भवती हुई है।
– यहां हर 1000 लड़कों पर सिर्फ 888 लड़कियां हैं।

ये सारे आंकड़े भारत के जिस राज्य की महिलाओं/लड़कियों का दर्द बयां कर रहे हैं वो राज्य है ‘राजस्थान’। वही राजस्थान जहां के मर्दों का ख़ून आजकल ज़बरदस्त उबाल मार रहा है। उनसे बर्दाश्त नहीं हो रहा कि कैसे उनके राज्य की शान मानी जानेवाली एक महिला/रानी पद्मावती का सम्मान बॉलीवुड की एक फिल्म कम कर सकती है। अब ये बात अलग है कि सड़कों पर पोस्टर जलानेवाले और फिल्म की हिरोइन की नाक काटकर लाने की धमकी देनेवालों में से किसी ने भी फिल्म देखी नहीं है और उन्हें पता तक नहीं है कि फिल्म में है क्या। लेकिन इससे फर्क क्या पड़ता है। उन्हें दिव्यज्ञान की प्राप्ति हुई है कि फिल्म पद्मावती (जो अब पद्मावत हो चुकी है) में रानी पद्मावती के किरदार को वो सम्मान नहीं मिला है जिसकी वो हकदार हैं।

सही बात है, अगर… फिर से कह रहा हूं.. ‘अगर’ रानी पद्मावती के सम्मान में फिल्म में कोई कमी हो तो गुस्सा आना भी चाहिए लेकिन फिल्म बनानेवाले, फिल्म को पास करनेवाले (सेंसर बोर्ड) और फिल्म देखकर आनेवाले पत्रकारों की सुनने को तैयार कौन है? राजस्थानी मर्दों और करणी सेना का पारा सातवें आसमान पर है।

लेकिन जितनी बार भी एंकरिंग करते हुए इन पोस्टर जलाते, तोड़फो़ड़ करते, हंगामा मचाते दृश्यों को देखता हूं तो मन ही मन सोचता हूं कि रानी पद्मावती आज होतीं तो ज़रुर कुछ सवाल पूछतीं इन समाज के ठेकेदार सैनिकों से।

पहला सवाल-
जिस राज्य के पुरुष इतिहास में कैद एक महिला की आबरु के लिए यूं सड़कों पर हैं वो क्यों तब सड़क पर नहीं उतरते जब रोज़ औसतन 10 लड़कियों की आबरु तार तार होती है सूबे में?

दूसरा सवाल-
लड़ाई एक महिला को सम्मान दिलाने की है तो सूबे की आधी से ज्यादा उन लड़कियों को स्कूल क्यों नहीं भेजते जो अनपढ़ घर पर बैठी हैं? पढ़ेंगीं तभी तो अपना सम्मान हासिल कर सकेंगीं। पढ़ने लिखने की उम्र में उन्हें ब्याहकर, गर्भवती बनाकर कौन सा मान देते हो उनको? तब उनकी हालत देखकर खून नहीं खौलता?

तीसरा सवाल-
अगर महिलाओं का सम्मान वाकई नाक की लड़ाई है तो 1000 लड़कों पर 888 लड़कियां ही क्यों हैं? कोख में मरती उन बच्चियों को दुनिया में आने और हक से जीने का सम्मान देने की लड़ाई क्यों नहीं लड़ते? भ्रुण हत्या के खिलाफ़ सड़कों पर क्यों नहीं उतरते, पुतले क्यों नहीं फूंकते?

चौथा सवाल-
महिलाएं बच्चों को जन्म देते वक्त जान गंवा रही हैं, आज भी लकड़ी पर खाना पकाकर धुएं में घुटती हैं… उसकी लड़ाई कौन लड़ेगा?

पांचवा सवाल-
जो राज्य सरकार पद्मावती के सम्मान की लड़ाई में फिल्म का विरोध करनेवालों के साथ खड़ी है वो उन महिलाओं के साथ क्यों नहीं खड़ी होती जिनका सम्मान हर रोज़ उनसे छीन लिया जाता है?

आखिरी सवाल-
जिस सूबे की मुख्यमंत्री महिला है, वहां महिलाओं का ये हाल क्यों है? और अगर पद्मावत नहीं भी रिलीज़ हुई तो क्या सूबे में लाखों-हज़ारों पद्मावतियों के साथ बलात्कार करनेवाले सारे खिलजी, घर में अत्याचार करनेवाला खिलजी, कोख में बच्ची को मार देने वाला खिलजी, पढ़ने के लिए न भेजनेवाले खिलजी भी मर जाएंगे क्या?

जो इतिहास का हिस्सा है उसके लिए लड़ रहे हो, जो वर्तमान में हैं उनके लिए आंखें क्यों मूंद ली है? क्यों खामोश हो? कब बोलोगे, कब लड़ोगे? और लड़ोगे भी या नहीं?

सोचना ज़रूर।

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