लघुकथा : लाभ का मद (अकाउंट)

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ये कहानी उस शहर की है जिसका नाम था – बिनदेखलपुर। और यहां रहते थे ईमानदार साहब। ईमानदार साहब का बहुत नाम था। लोग मानते थे कि जैसा नाम था वैसी ही उनकी नीयत भी थी। शहर-शहर लोग चर्चा करते तो ईमानदार साहब के लिए एक ही बात कहते.. क्रांतिकारी, बहुत क्रांतिकारी।

बिनदेखलपुर भी अपनी रफ्तार से आगे बढ़ रहा था। पर अचानक वो दौर आया जब यहां काले धन का काला खेल शुरु हो गया। कमल बाबू और हस्तराम साहब पर आरोप लगने लगे कि वो और उनका पूरा कुनबा काला धन जमा कर रहा है। ईमानदार साहब ने क्रांति कर दी। दोनों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। लोगों का भी ईमानदार साहब में विश्वास बढ़ने लगा। लोगों को लगा कि ईमानदार साहब ही बिनदेखलपुर को काले धन की काली छाया से मुक्त कराएंगे।

पर अचानक एक दिन पता चला कि ईमानदार साहब के कुनबे के कुछ लोगों के पास ‘लाभ का मद(अकाउंट) ‘है। इसमें वो सारा पैसा रखा जाता है जो टैक्स चोरी से बचाया गया था। लोगों की भवें तन गईं कि ये कैसे संभव है। ये तो गलत है। पंचायत ने ईमानदार साहब के कुनबे के लोगों को लाभ का मद मामले में सज़ा सुना दी। ईमानदार साहब तिलमिला गए क्योंकि सवाल उनपर भी था और उनकी नीयत पर भी। उन्होंने फौरन पंचायत पर ही सवाल उठा दिए और लाभ के मद के बारे में लोगों के सामने आकर ये बातें कहीं-

1. लाभ का मद तो दरअसल लाभ का मद (अकाउंट) है ही नहीं क्योंकि इसमें सारा पैसा तो उन्हीं का है जिन्होंने उसे सरकार को न देकर खुद रख लिया। यानि पैसा तो उनका ही था.. सरकार से एक पैसा भी लिया नहीं, यानि लाभ हुआ नहीं तो वो अकाउंट लाभ का मद हुआ कैस? किसी ने ईमानदार साहब को समझाया कि ये तो टैक्स चोरी हुई, और ये भी काला धन ही हुआ… और इसलिए ये गलत है। लेकिन ईमानदार साहब नहीं माने।
2. ईमानदार साहब ने दूसरी अहम बात कही कि कमल बाबू और हस्तराम साहब के कुनबे के लोगों के पास भी तो लाभ का मद है जिसमें टैक्स चोरी का पैसा है। इसलिए उनकी गलती, गलती नहीं है। किसी ने बहुत समझाया कि आप तो कमल बाबू और हस्तराम साहब जैसे न थे और आपका गलत इसलिए तो सही नहीं हो जाता क्योंकि उन्होंने गलत कर रखा है। पर ईमानदार बाबू फिर नहीं माने।
3. किसी ने पूछा कि अगर लाभ के मद का पैसा गलत नहीं था तो अलग से तिजोरी मंगाकर उसे छिपाने की कोशिश क्यों की? वो तो तिजोरी की चाभी प्रमुख पंच ने देने से मना कर दी नहीं तो तिजोरी में सारा पैसा डालकर गायब कर ही दिया गया था। लेकिन ईमानदार साहब ने कह दिया कि ऐसा नहीं है, तिजोरी तो इसलिए लाई गई थी कि सारा पैसा एक जगह रहे और लाभ के मद का हंगामा ही न मचे। किसी ने पूछा यानि आप मान रहे हैं कि वो सारा पैसा लाभ के मद का था पर ईमानदार बाबू कहां मानने वाले थे। वो फिर इनकार कर गए। वो बार बार एक ही बात कहते कि पैसा तो सरकार से लिया ही नहीं, तो अपना पैसा कैसे लाभ का हो गया।
4. यही नहीं, ईमानदार साहब ने ये भी कह दिया कि पंचों ने तो उन्हें लाभ के मद के नोट दिखाने और अपनी बेगुनाही साबित करने का मौका ही नहीं दिया। पंच तक हैरान थे कि उन्होंने तो कई बार चिट्ठी भिजवाई लेकिन ईमानदार बाबू और उनके कुनबे के लोग डाकिये से चिट्ठी तो ले लेते लेकिन कभी मिलने ही नहीं आते। ऐसे में उनका नाम घसीटना कहां तक सही था।

खैर, कुल मिलाकर हुआ ये कि बिनदेखलपुर के लोग जहां ईमानदार बाबू से उम्मीद लगाए बैठे थे कि वो कमल बाबू और हस्तराम साहब से इतर शहर को बदलकर रख देंगें, वही ईमानदार बाबू अब खुद बदले बदले से लगने लगे थे। पर लोग करते भी तो क्या, उनके पास विकल्प ही क्या था।
बिनदेखलपुर वो सब देख चुका था जो उसने देखने की उम्मीद शायद ही की थी।

(डिसक्लेमर: इस लघुकथा- ‘लाभ का मद’ का लाभ के पद मामले से अगर आपको कोई मेल लग रहा है तो ये आपकी कलप्ना का हिस्सा है। और अगर आपको लगता है कि ईमानदार बाबू के जवाब, आम आदमी पार्टी के लाभ के पद के मामले में दिए उन जवाबों से मेल खाते हैं जिसमें कहा गया कि लाभ का पद तो लाभ का पद है ही नहीं क्योंकि कोई पैसा नहीं लिया गया, लाभ का पद हटानेवाला संशोधन बिल इसलिए लाया गया ताकि ये परेशानी ही खत्म हो, दूसरे राज्यों में भी तो है लाभ का पद और चुनाव आयोग ने तो हमें सुना ही नहीं… तो ये आपकी सोच है, मैं क्या कर सकता हूं।)

26 thoughts on “लघुकथा : लाभ का मद (अकाउंट)

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