काला हिरण नहीं, सज़ा का मकसद भी ‘विलुप्त’ हो रहा है !!

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दुनिया के किसी भी हिस्से में चले जाइए या फिर इतिहास के किसी भी युग को खंगाल लीजिए, किसी को भी सज़ा दी गई है तो उसके पीछे एक ‘मकसद’ रहा है। यहां तक की घर में किसी बच्चे तक को पढ़ाई न करने पर या शैतानी करने पर मां-बाप कोई सज़ा देते हैं तो उसका भी एक मकसद होता है कि बच्चा सुधर सके या संस्कार सीख सके या शैतानी न करे। कभी सुना है कि 5 साल के एक बच्चे ने खिलौना तोड़ देनेवाले मोहल्ले के एक दूसरे बच्चे को थप्पड़ मारा हो तो उसके मां-बाप ने 20 साल बाद (जब बच्चा 25 साल का समझदार युवक है) उस बच्चे को पीटा हो और खाना पीना बंद कर दिया हो या सज़ा के तौर पर घर से निकाल दिया हो कि तूने उस बच्चे को क्यों मारा था? लेकिन हमारे देश की न्याय व्यवस्था में फैसलों में जो देरी होती है उसमें कमोबेश सज़ा देने का मकसद कुछ यूं हीं खत्म हो जाता है। सच है कि अदालतों में पहुंचनेवाले मामले इस उदाहरण से कहीं ज्यादा संगीन होते हैं लेकिन सज़ा का मकसद तो तब भी सज़ा सुनाने के पीछे होता ही है।
सलमान खान को काले हिरण के शिकार मामले में 20 साल बाद ट्रायल कोर्ट से सज़ा हुई है। संभवत: सलमान खान को एक दो दिन में जमानत मिल जाएगी और मामले का सेशन कोर्ट, फिर हाईकोर्ट, फिर सुप्रीम कोर्ट और फिर रिव्यू पिटीशन की सीढ़ियां चढ़ते चढ़ते दम फूल जाएगा लेकिन मैं बस समझना चाहता हूं कि इस वक्त सलमान ख़ान को 5 साल जेल में रखने की सज़ा का मकसद इनमें से क्या है–

1. सुधार-
कायदे से सोचिएगा तो जेल को एक सुधार गृह ही होना चाहिए जहां वो शख्स जो अपनी आपराधिक छवि की वजह से समाज के बीच रहने लायक न हो, वो जाए.. सज़ा काटे.. सुधरे और फिर समाज की मुख्य धारा से जुड़ जाए। हांलाकि अमूमन ऐसा होता नहीं है। या तो जेल जाने वाले कई लोग ज्यादा शातिर अपराधी बनकर निकलते हैं या फिर सुधरकर भी मुख्यधारा का हिस्सा नहीं बन पाते। खैर, वो बात अलग है.. मेरा सवाल ये है कि अगर सलमान खान को सज़ा देने का मकसद उस व्यक्ति को सुधारना है जो नियमों को ताख़ पर रखता है और काले हिरण जैसे संरक्षित जीव को मार देता है तो वो मकसद आज कैसे पूरा होगा? क्या 32 साल की उम्र वाला, गर्म खून.. स्टारडम के जोश और मेरा कोई क्या बिगाड़ लेगा की सोचवाला सलमान खान आज 52 साल की उम्र में भी वही सलमान खान है? सलमान खान को छोड़िए, सिर्फ अपने आप से एक बार पूछिए कि क्या आप 5 साल वाले खुद में और आज के खुद में अंतर नहीं पाते? तो इस सज़ा से आप किस सलमान को सुधारेंगे? उस सलमान को जो पहले ही हज़ारों लोगों को बिइंग ह्यूमन के ज़रिए मदद पहुंचा रहा है या फिर उस सलमान को जो सैंकड़ों बच्चों की पढ़ाई का पूरा खर्च उठा रहा है?

2. समाज में रहने लायक नहीं-
क्या सलमान को आज 20 साल बाद जेल में कैद करने का मकसद ये हो सकता है कि वो इतने खूंखार या आपराधिक छवि के हैं कि समाज में रहने लायक नहीं? सलमान को करीब से जानने वाला शख्स हो या बड़े पर्दे पर देखकर उनसे जुड़नेवाला शख्स.. कोई भी ये नहीं मान सकता कि सलमान इतने खूंखार हैं कि समाज में रहने लायक नहीं। शायद कभी थे भी नहीं। तो फिर एक ऐसे शख्स को जो कमाता है तो लोगों पर खर्चता भी है उसे जेल में डालकर क्या हासिल होगा? क्या कोई है जो आज ताल ठोक कर ईमानदारी के साथ ये कहे कि सलमान खान को फौरन जेल में डालो, ये समाज में रहने लायक नहीं? एक मिनट भी बाहर रहा तो पूरे सिस्टम को खराब कर देगा?

3. पीड़ित को न्याय-
20 साल बाद किस पीड़ित को न्याय मिलेगा? काले हिरण के शिकार मामले में कोई कह सकता है कि एक जानवर को क्या न्याय मिलना पर मैं ऐसा नहीं मान सकता। जीने का अधिकार सबका है तो उस अधिकार में हनन करने के खिलाफ न्याय मिलना भी अधिकार सबका है। इतना ही नहीं, जो बिश्नोई समाज प्रकृति और जानवरों को पूजता है ये मसला उसको न्याय मिलने का भी है। लेकिन 20 साल बाद? वो भी न्याय कितने दिन का? 2 दिन या 3 दिन… क्योंकि आज नहीं तो कल जमानत मिल ही जाएगी.. और फिर ऊपरी अदालतों के चक्कर का सिलसिला शुरु होगा… जिन लोगों ने न्याय की लड़ाई शुरु की होगी उनमें से कितने जिन्दा बचेंगे तब तक ये भी नहीं पता। जिस तेज़ी से काले हिरणों की संख्या घट रही है, सलमान को सज़ा मिलते मिलते तक वो संरक्षित प्रजाति से विलुप्त प्रजाति में तब्दील हो जाएंगे या नहीं इसकी भी गारंटी नहीं। फिर ये किसके न्याय की लड़ाई लड़ी जा रही है या बची है? वक्त बीता तो राजीव गांधी के हत्यारों तक को माफ़ कर दिया प्रियंका और राहुल गांधी ने। उनके जख्म तो वक्त और समझ ने भर दिए लेकिन ज्यादातर मामलों में तो न्याय का इंतज़ार ही न्याय पाने के उत्साह और मकसद को लील जाता है।

4. समाज को संदेश-
सलमान खान को जेल में डाल देने से अगर काले हिरण का शिकार रुक जाए तो मैं तो कहता हूं आजीवन डाल दीजिए। लेकिन ऐसा होगा नहीं, लिखित में ले लीजिए। 1998 से 2018 के इन बीस सालों में काले हिरण सलमान खान की वजह से ही सबसे ज्यादा चर्चा में रहे लेकिन बावजूद इसके न तो उनका शिकार बंद हुआ और न उनकी संख्या बढ़ी। संजय दत्त को हथियार रखने के मामले में सज़ा मिल जाने से युवाओं को संदेश मिल गया होता तो या तो देश में अपराध कम हो गया होता या फिर युवा आतंकी न बन रहे होते।

एक बात बहुत साफ कर दूं कि मेरे कहने का मकसद ये कतई नहीं कि दोषी को सज़ा न हो। बिलकुल हो। सलमान हो, संजय दत्त या कोई भी ए, बी, सी… दोषी है तो सज़ा ज़रुर हो लेकिन कहना बस ये चाहता हूं कि ऊपर जो मकसद गिनाए हैं वो सारे तब ही पूरे हो सकते हैं जब सज़ा ‘समय’ पर हो। अदालतों में करोड़ों मामले लंबित हैं… जजों के पद खाली हैं… लोग अदालतों के चक्कर पर चक्कर लगा रहे हैं और सबकुछ एक चक्र की तरह बस चल रहा है… सज़ा क्यों मिल रही है.. क्या मकसद है.. किसी को नहीं पता… लोग अदालतों में उम्मीद के साथ जाते हैं… पर उम्मीद के उस चेहरे पर भी झुर्रियां पड़ जाती हैं सालों साल के इंतज़ार से। सलमान खान और संजय दत्त के मामले इस बात को चीख चीखकर कह रहे हैं कि देश की न्याय व्यवस्था को सुधारिए… कोर्ट बनाइए.. जज लाइए… सिस्टम को तेज़ कीजिए.. काले हिरण के विलुप्त होने की चर्चा तो कर रहे हैं लेकिन विलुप्त होते सज़ा के ‘मकसद’ की भी चर्चा कीजिए।

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