FACT CHECK: रफेल विवाद में क्या सच, क्या झूठ

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रफेल… ये वो नाम है जो कायदे से तो देश की वायुसेना की ताक्त का दूसरा नाम होना चाहिए था लेकिन दुर्भाग्यवश पहला रफेल 2019 में भारतीय आकाश में उड़े उससे पहले ही रफेल डील का विवाद सियासी आसमान में तेज़ी से उड़ रहा है। देश की रक्षामंत्री से लेकर वायुसेना प्रमुख और फ्रांस की सरकार के बयानों के बावजूद रफेल विवाद जिन्दा है और ऐसे में रोज़ नए सवालों के बीच इस बात का FACT CHECK जरुरी हो जाता है कि आरोप वाकई टिकने लायक हैं या उनका क्रैश होना लाज़मी है।

यूपीए सरकार के जमाने में वायुसेना की ताकत बढ़ाने के लिए शुरु हुई एक उपयुक्त फाइटर जेट की तलाश रफेल डील के साथ जाकर खत्म हुई। यूपीए सरकार के वक्त डील को लेकर रफेल बनाने वाली कंपनी डसॉ एविएशन से सालों साल की बातचीत एनडीए सरकार के वक्त खत्म हो गई और फिर भारत सरकार औऱ फ्रांस की सरकारों की बीच सितंबर 2016 में समझौता साइन हुआ 36 रफेल विमान खरीदे जाने का। हांलाकि इसकी नींव 2015 में प्रधानमंत्री नरेनद्र मोदी के फ्रांस दौरे के दौरान ही पड़ी।

पूरे विवाद के अलग अलग पहलूओं पर एक एक करके नज़र डालते हैं औऱ उनका FACT CHECK करते हैं।

विवाद– मोदी 2015 में अकेले सारा सौदा कर आए और भारत में किसी को पता तक नहीं चला।

FACT CHECK– भारत की तरफ से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और फ्रांस के राष्ट्रपति के बीच इस बात को लेकर समझौता हुआ कि भारत 36 रफेल विमान खरीदेगा औऱ फ्रांस एक बेहतर डील और समयबद्ध डिलीवरी में भारत की मदद करेगा। हांलाकि यह सिर्फ समझौते की शुरुआत थी। इसके बाद फ्रांस के रक्षामंत्री और भारतीय समकक्ष के बीच कई बार बातचीत हुई। फ्रांस के रक्षामंत्री का भारत दौरा हुआ औऱ उनके सितंबर 2016 के भारत दौरे के वक्त ही दोनों देशों के बीच IGA यानि इटर गवर्नमेंटल एग्रीमेंट साइन हुआ।

FACT CHECK SOURCE– भारत-फ्रांस ज्वाइंट स्टेटमेंट 2015 (तस्वीर 1 देखें) और भारतीय विदेश मंत्रालय की ब्रीफिंग 2016 (तस्वीर 2 देखें)

तस्वीर 1

तस्वीर 2

विवाद– रफेल डील कितने में हुई इसकी जानकारी नहीं दी गई और डील में घोटाला है इसलिए सरकार रफेल की कीमत का डीटेल्ड ब्रेकअप नहीं दे रही।

FACT CHECK– रक्षामंत्रालय की 7 फरवरी 2018 की जानकारी के मुताबिक संसद में रफेल डील की सन्निकट यानि लगभग कीमत बताई गई है। साथ ही एक एक रफेल का विस्तृत ब्रेकअप इसलिए नहीं दिया गया क्योंकि इससे रफेल के कस्टमाइज़ेशन और हथियारों की जानकारी लीक हो जाएगी जो कि सेना की तैयारियों और देश की सुरक्षा के साथ समझौता होगा।

FACT CHECK SOURCE– रक्षा मंत्रालय का विस्तृत जवाब (देखें तस्वीर 3)

तस्वीर 3

विवाद– रफेल डील मोदी ने अकेले कर ली। इसमें नियमों की अनदेखी हुई और कैबिनेट कमिटी ऑन सिक्योरिटी से इजाज़त भी नहीं ली गई।

FACT CHECK 7 फरवरी 2018 के अपने लिखित जवाब में रक्षा मंत्रालय इस बात का स्पष्ट उल्लेख करता है कि दोनों देशों के बीच रफेल डील साइन होने के पहले सारे डिफेंस प्रोक्योरमेंट प्रोसीजर फॉलो किए गए, नेगोशिएशन्स हुईं और कैबिनेट कमिटी ऑन सिक्योरिटी की इजाज़त के बाद डील साइन हुई।

FACT CHECK SOURCE– रक्षा मंत्रालय का विस्तृत जवाब (देखें तस्वीर 4)

तस्वीर 4

विवाद– मोदी सरकार देश की सुरक्षा को खतरा बताकर अपना घोटाला छिपा रही है।

FACT CHECK– मोदी सरकार ही नहीं बल्कि यूपीए सरकार और दूसरी सरकारें भी कई मौकों पर रक्षा सौदों की विस्तृत जानकारी देने से मना करती रही हैं क्योंकि विस्तृत जानकारी दुश्मन देश को भी मिलने से देश की सुरक्षा को खतरा रहता है।

FACT CHECK SOURCE– यूपीए सरकार का 9 मई 2007 को रक्षा सौदों को लेकर दिया जवाब (देखें तस्वीर 5)

तस्वीर 5

विवाद– मोदी सरकार ने रफेल डील में Offset Partner का कॉन्ट्रैक्ट रिलायंस को दे दिया।

FACT CHECK– Offset Partner चुनने का अधिकार डील करनेवाली कंपनी का होता है। यूपीए सरकार ने 2012 में नियम बनाकर इसका जिक्र किया कि वेंडर अपना इंडियन ऑफसेट पार्टनर चुनने के लिए स्वतंत्र है (देखें तस्वीर 6) । इतना ही नहीं रफेल बनानेवाली कंपनी डसॉ एविएशन ने अपनी सालान रिपोर्ट में इसका जिक्र किया है कि उसने खुद रिलायंस के साथ पार्टनरशिप की है (देखें तस्वीर 7) और इसमें उसका फायदा इस लिहाज़ से नजर आता है कि रिलायंस के साथ साझेदारी को वो दूसरे क्षेत्रों में भी आगे ले जा पाने में कामयाब रही जब उसने रिलायंस एयरपोर्ट डेवलपर्स लिमिटेड में 35 फीसदी का स्टेक ले लिया और भारत में एयरपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर के कारोबार में भी शामिल हो गई। (देखें तस्वीर 8)

FACT CHECK SOURCE– यूपीए सरकार का सर्कुलर (तस्वीर 6) , रफेल बनानेवाली डसॉ एविएशन की एनुअल रिपोर्ट (तस्वीर 7 और तस्वीर 8)

तस्वीर 6

तस्वीर 7

तस्वीर 8

विवाद– ये इकलौता ऐसा सौदा है कि एक नीजि कंपनी को रक्षा सौदे में भागीदारी मिल गई।

FACT CHECK – साल 2001 से लेकर 2016 के बीच 333 नीजि कंपनियों को डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग के लिए लाइसेंस मिला। रिलायंस इंडसट्रीज़ लिमिटेड से लेकर टाटा ग्रुप, लार्सन एंड टर्बो लिमिटेड, गोदरेज ग्रुप और महिंद्रा ग्रुप जैसी कई निजी कंपनियां अलग अलग रक्षा सौदों में हिस्सा हैं।

FACT CHECK SOURCE– सरकारी रिपोर्ट (देखें तस्वीर 9)

तस्वीर 9

विवाद– भारत का रफेल सौदा दूसरे देशों के सौदे के मुकाबले महंगा है।

FACT CHECK मिस्र और कतर जैसे मुल्कों ने भी रफेल खरीदा है और भारत से कहीं ज्यादा कीमत पर खरीदा है।

FACT CHECK SOURCE– इंडिया टुडे (देखें तस्वीर 10)

तस्वीर 10

इसमें कोई शक नहीं कि रफेल भारतीय वायुसेना की ताकत को कई गुना बढ़ा देगा पर उम्मीद यही की जानी चाहिए कि पहला रफेल भारत पहुंचे उससे पहले रफेल का सियासी विवाद खत्म हो चुका होगा।

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