EVM सच्चा, बाकी झूठे क्यों

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चुनाव आएंगे, जाएंगे.. नेता आएंगे, जाएंगे लेकिन देश वहीं रहता है और सर्वोपरि रहता है और इसलिए बहुत जरुरी है कि चुनाव में धांधली और EVM हैकिंग या स्वैपिंग के शोर के बीच ये समझा जाए कि कौन सच्चा है और कौन झूठा।

EVM पर विश्वास करने की कई वजहें हैं और उन्हें वजहों पर विश्वास करने का भी आधार है। EVM और EVM के जरिए चुनाव कराने की पूरी प्रक्रिया को समझिएगा तो फैसला करने की स्थिति में खुद हो जाइएगा।

सबसे पहले EVM का टेक्निकल पहलू-
– मशीन में किसी तरह का कोई नेटवर्क नहीं होता जो बाहर से नियंत्रित या हैक किया जा सके
– मशीन वन टाइम प्रोगरैमेबल होती है। यानि उसकी कोडिंग एक बार इस्तेमाल के लिए होती है और दूसरी दफे इस्तेमाल के लिए उसे फिर से एक अलग कोड के इस्तेमाल के जरिए तैयार किया जाता है

अब समझिए EVM का प्रायोगिक पहलू-

– EVM के फर्स्ट टाइम यूज़ से लेकर उससे वोट कराने, उसे सुरक्षित रखने और उसकी वोट काउंटिंग तक में करीब 1 करोड़ से ज्यादा लोग जुटे होते हैं। सबको खरीद लेना या सबका गलत इस्तेमाल करना असंभव है।
– चुनाव आयोग की लंबी चौड़ी तय प्रक्रिया EVM के इस्तेमाल को फूल प्रूफ बनाती है
– चुनाव से पहले EVM की फर्स्ट लेवल चेकिंग होती है। इस चेकिंग में सारी पार्टियों के प्रतिनिधि मौजूद होते हैं। साथ ही EVM बनानेवाली कंपनी BEL/ECIL के प्रतिनिधि मौजूद रहते हैं। EVM बनानेवाली कंपनी के इंजीनियर ये चेक करते हैं कि किसी तरह के हार्डवेयर का बदलाव नहीं किया गया है। इसके बाद EVM के कंट्रोल यूनिट को पिंक स्लिप से सील करके स्ट्रॉन्ग रुम में रख दिया जाता है। इस स्लिप पर हर पार्टी के प्रतिनिधि के दस्तखत होते हैं ताकि सील बदली न जा सके। ये सारी प्रक्रिया डिस्ट्रिक्ट इलेक्शन ऑफिसर के सामने होती है।
– इतना ही नहीं EVM की फर्स्ट लेवल चेकिंग के दौरान राजनीतिक दलों के प्रतिनिध 5% EVM मशीनें रैंडमली चुनते हैं जिनमें 1000 वोट डालकर चेक किया जाता है कि वोटों की गलती तो नहीं हो रही और कोई वोट इधर से उधर नहीं जा रहा। ये वोट खुद राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि डालते हैं और उनके संतुष्ट होने पर ही कंट्रोल यूनिट सील की जाती है। सारी प्रक्रिया को दस्तावेज में नोट किया जाता है।
– चुनाव के लिए किसी भी पोलिंग बूथ पर कौन सा EVM जाएगा ये किसी को पता नहीं होता क्योंकि EVM का चुनाव दो दौर की रैंडम सलेक्शन के बाद होता है।
– कौन से पोलिंग बूथ पर कौन सा अधिकारी होगा ये भी रैंडम सलेक्शन के जरिए होता है।
– सारी रैंडम सलेक्शन की प्रक्रिया डिस्ट्रिक्ट इलेक्शन ऑफिसर, राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों और चुनाव पर्यवेक्षकों के सामने होती है।
– इतना ही नहीं किसी पोलिंग बूथ पर इस्तेमाल EVM का एक यूनिक कोड होता है जो कि हर पार्टी के पोलिंग एजेंट को दिया जाता है। जिसका मिलान काउंटिंग शुरु होने के पहले पोलिंग एजेंट कर सकते हैं। ये एक ऐसे स्टेप है जो कि EVM बदले जाने की किसी भी संभावना को पूरी तरह से खत्म कर देता है।
– EVM पर बैलेट पेपर में प्रत्याशियों के नाम भी हर विधानसभा क्षेत्र में अलग अलग सीरियल नंबर पर होते हैं ताकि किसी तरह की कोई गड़बड़ न हो सके।
– चुनाव के दिन चुनाव शुरु होने से पहले भी एक मॉक पोल यानि नकली पोल सारे राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों के सामने कराया जाता है और मशीन के ठीक काम करने की पुष्टि होने के बाद सारे राजनीतिक दल के प्रतिनिधि प्रीसाइडिंग ऑफिसर को साइन करके सर्टिफिकेट देते हैं और फिर चुनाव शुरु होता है।
– चुनाव के बाद प्रीसाइडिंग ऑफिसर सभी पार्टियों के प्रतिनिधि के सामने EVM का क्लोज़ बटन दबाता है जिसके बाद कोई वोट नहीं पड़ सकता।
– इसके बाद EVM सील कर दिया जाता है। राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों को इस बात की इजाज़त होती है कि वो सील पर अपने दस्तखत करें ताकि EVM बदले न जा सकें और काउंटिंग के पहले सील खुलते वक्त सिग्नेचर का मिलान सबूत रहे इस बात का कि EVM बदले नहीं गए।
– इतना ही नहीं, जिस स्ट्रॉन्ग रुम में EVM रखे जाते हैं वो भी सील किया जाता है और उसपर 24 घंटे सुरक्षाबल नजर रखते हैं। स्ट्रॉन्ग रुम पर राजनीतिक दलों को अपना सील लगाने की भी इजाजत होती है और उन्हें रुम पर 24 घंटे नजर रखने की भी छूट होती है।

यानि मोटे तौर पर एक बहुत लंबी चौड़ी और अलग अलग स्तर पर किसी भी हेरफेर को नकारने की प्रक्रिया के बाद एक चुनाव पूरा होता है। हर प्रक्रिया राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों के सामने पूरी होती है। इस पूरी प्रक्रिया को समझने के बाद शायद ही कोई EVM की हैकिंग या स्वैपिंग का सवाल उठा सकता है। राजनीतिक पार्टियां सब जानने के बाद भी ऐसा करती हैं तो उनकी मंशा समझी जा सकती है लेकिन देश के लोकतंत्र को सुरक्षित रखने के लिए जरुरी है कि हर आम आदमी को ये पूरी प्रक्रिया पता हो और वो किसी के झांसे में न आए।

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