FACT CHECK: रफेल विवाद में क्या सच, क्या झूठ

रफेल… ये वो नाम है जो कायदे से तो देश की वायुसेना की ताक्त का दूसरा नाम होना चाहिए था लेकिन दुर्भाग्यवश पहला रफेल 2019 में भारतीय आकाश में उड़े उससे पहले ही रफेल डील का विवाद सियासी आसमान में तेज़ी से उड़ रहा है। देश की रक्षामंत्री से लेकर वायुसेना प्रमुख और फ्रांस की सरकार के बयानों के बावजूद रफेल विवाद जिन्दा है और ऐसे में रोज़ नए सवालों के बीच इस बात का FACT CHECK जरुरी हो जाता है कि आरोप वाकई टिकने लायक हैं या उनका क्रैश होना लाज़मी है।

यूपीए सरकार के जमाने में वायुसेना की ताकत बढ़ाने के लिए शुरु हुई एक उपयुक्त फाइटर जेट की तलाश रफेल डील के साथ जाकर खत्म हुई। यूपीए सरकार के वक्त डील को लेकर रफेल बनाने वाली कंपनी डसॉ एविएशन से सालों साल की बातचीत एनडीए सरकार के वक्त खत्म हो गई और फिर भारत सरकार औऱ फ्रांस की सरकारों की बीच सितंबर 2016 में समझौता साइन हुआ 36 रफेल विमान खरीदे जाने का। हांलाकि इसकी नींव 2015 में प्रधानमंत्री नरेनद्र मोदी के फ्रांस दौरे के दौरान ही पड़ी।

पूरे विवाद के अलग अलग पहलूओं पर एक एक करके नज़र डालते हैं औऱ उनका FACT CHECK करते हैं।

विवाद– मोदी 2015 में अकेले सारा सौदा कर आए और भारत में किसी को पता तक नहीं चला।

FACT CHECK– भारत की तरफ से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और फ्रांस के राष्ट्रपति के बीच इस बात को लेकर समझौता हुआ कि भारत 36 रफेल विमान खरीदेगा औऱ फ्रांस एक बेहतर डील और समयबद्ध डिलीवरी में भारत की मदद करेगा। हांलाकि यह सिर्फ समझौते की शुरुआत थी। इसके बाद फ्रांस के रक्षामंत्री और भारतीय समकक्ष के बीच कई बार बातचीत हुई। फ्रांस के रक्षामंत्री का भारत दौरा हुआ औऱ उनके सितंबर 2016 के भारत दौरे के वक्त ही दोनों देशों के बीच IGA यानि इटर गवर्नमेंटल एग्रीमेंट साइन हुआ।

FACT CHECK SOURCE– भारत-फ्रांस ज्वाइंट स्टेटमेंट 2015 (तस्वीर 1 देखें) और भारतीय विदेश मंत्रालय की ब्रीफिंग 2016 (तस्वीर 2 देखें)

तस्वीर 1

तस्वीर 2

विवाद– रफेल डील कितने में हुई इसकी जानकारी नहीं दी गई और डील में घोटाला है इसलिए सरकार रफेल की कीमत का डीटेल्ड ब्रेकअप नहीं दे रही।

FACT CHECK– रक्षामंत्रालय की 7 फरवरी 2018 की जानकारी के मुताबिक संसद में रफेल डील की सन्निकट यानि लगभग कीमत बताई गई है। साथ ही एक एक रफेल का विस्तृत ब्रेकअप इसलिए नहीं दिया गया क्योंकि इससे रफेल के कस्टमाइज़ेशन और हथियारों की जानकारी लीक हो जाएगी जो कि सेना की तैयारियों और देश की सुरक्षा के साथ समझौता होगा।

FACT CHECK SOURCE– रक्षा मंत्रालय का विस्तृत जवाब (देखें तस्वीर 3)

तस्वीर 3

विवाद– रफेल डील मोदी ने अकेले कर ली। इसमें नियमों की अनदेखी हुई और कैबिनेट कमिटी ऑन सिक्योरिटी से इजाज़त भी नहीं ली गई।

FACT CHECK 7 फरवरी 2018 के अपने लिखित जवाब में रक्षा मंत्रालय इस बात का स्पष्ट उल्लेख करता है कि दोनों देशों के बीच रफेल डील साइन होने के पहले सारे डिफेंस प्रोक्योरमेंट प्रोसीजर फॉलो किए गए, नेगोशिएशन्स हुईं और कैबिनेट कमिटी ऑन सिक्योरिटी की इजाज़त के बाद डील साइन हुई।

FACT CHECK SOURCE– रक्षा मंत्रालय का विस्तृत जवाब (देखें तस्वीर 4)

तस्वीर 4

विवाद– मोदी सरकार देश की सुरक्षा को खतरा बताकर अपना घोटाला छिपा रही है।

FACT CHECK– मोदी सरकार ही नहीं बल्कि यूपीए सरकार और दूसरी सरकारें भी कई मौकों पर रक्षा सौदों की विस्तृत जानकारी देने से मना करती रही हैं क्योंकि विस्तृत जानकारी दुश्मन देश को भी मिलने से देश की सुरक्षा को खतरा रहता है।

FACT CHECK SOURCE– यूपीए सरकार का 9 मई 2007 को रक्षा सौदों को लेकर दिया जवाब (देखें तस्वीर 5)

तस्वीर 5

विवाद– मोदी सरकार ने रफेल डील में Offset Partner का कॉन्ट्रैक्ट रिलायंस को दे दिया।

FACT CHECK– Offset Partner चुनने का अधिकार डील करनेवाली कंपनी का होता है। यूपीए सरकार ने 2012 में नियम बनाकर इसका जिक्र किया कि वेंडर अपना इंडियन ऑफसेट पार्टनर चुनने के लिए स्वतंत्र है (देखें तस्वीर 6) । इतना ही नहीं रफेल बनानेवाली कंपनी डसॉ एविएशन ने अपनी सालान रिपोर्ट में इसका जिक्र किया है कि उसने खुद रिलायंस के साथ पार्टनरशिप की है (देखें तस्वीर 7) और इसमें उसका फायदा इस लिहाज़ से नजर आता है कि रिलायंस के साथ साझेदारी को वो दूसरे क्षेत्रों में भी आगे ले जा पाने में कामयाब रही जब उसने रिलायंस एयरपोर्ट डेवलपर्स लिमिटेड में 35 फीसदी का स्टेक ले लिया और भारत में एयरपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर के कारोबार में भी शामिल हो गई। (देखें तस्वीर 8)

FACT CHECK SOURCE– यूपीए सरकार का सर्कुलर (तस्वीर 6) , रफेल बनानेवाली डसॉ एविएशन की एनुअल रिपोर्ट (तस्वीर 7 और तस्वीर 8)

तस्वीर 6

तस्वीर 7

तस्वीर 8

विवाद– ये इकलौता ऐसा सौदा है कि एक नीजि कंपनी को रक्षा सौदे में भागीदारी मिल गई।

FACT CHECK – साल 2001 से लेकर 2016 के बीच 333 नीजि कंपनियों को डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग के लिए लाइसेंस मिला। रिलायंस इंडसट्रीज़ लिमिटेड से लेकर टाटा ग्रुप, लार्सन एंड टर्बो लिमिटेड, गोदरेज ग्रुप और महिंद्रा ग्रुप जैसी कई निजी कंपनियां अलग अलग रक्षा सौदों में हिस्सा हैं।

FACT CHECK SOURCE– सरकारी रिपोर्ट (देखें तस्वीर 9)

तस्वीर 9

विवाद– भारत का रफेल सौदा दूसरे देशों के सौदे के मुकाबले महंगा है।

FACT CHECK मिस्र और कतर जैसे मुल्कों ने भी रफेल खरीदा है और भारत से कहीं ज्यादा कीमत पर खरीदा है।

FACT CHECK SOURCE– इंडिया टुडे (देखें तस्वीर 10)

तस्वीर 10

इसमें कोई शक नहीं कि रफेल भारतीय वायुसेना की ताकत को कई गुना बढ़ा देगा पर उम्मीद यही की जानी चाहिए कि पहला रफेल भारत पहुंचे उससे पहले रफेल का सियासी विवाद खत्म हो चुका होगा।

क्या आप भी जिन्ना की तस्वीरवाले स्वप्न’रोष’ से पीड़ित हैं?

क्या आप भी जिन्ना की तस्वीरवाले स्वप्न’रोष’ से पीड़ित हैं?

इस आर्टिकल को पढ़ने से पहले अपनी नब्ज़ टटोलकर, माथे पर हाथ फेरकर या फिर गूगल करके स्वपनरोष नाम की बीमारी का ब्योरा ढूंढ रहे हैं तो रुक जाइए।
न किसी ट्रेन के सफर में दीवार पर इसके इलाज का दावा करनेवाले डॉक्टर का नाम दिखेगा और ना ही हाशमि दवाखाने में इस मर्ज़ का इलाज मिलेगा। इसके बारे में आपको मैं बताऊंगा।
मोहम्मद अली जिन्ना… आपने इनके बारे में सुना होगा…
स्वप्नदोष … आपने इसके बारे में भी सुना ही होगा…
लेकिन सवाल ये है कि स्वप्नरोष क्या है और इसका जिन्ना विवाद से क्या लेना देना है?
दरअसल, स्वप्नरोष वो मनोस्थिति है जिसमें आपको रोष यानि गुस्से से भर दिया जाता है और इसके लिए आपको एक ख्याली दिवा स्वपन दिखाया जाता है… जो आपमें एक ख़ौफ पैदा कर दे … और फिर वो खौफ आहिस्ता आहिस्ता उस गुस्से को जन्म दे जिससे आपकी सोचने और तर्क करने की शक्ति ही खत्म हो जाए।
अब स्वप्नरोष नाम की ये बीमारी जिन्ना की तस्वीर विवाद मामले में कैसे वायरस की तरह फैली वो समझिए।
दीवार पर 80 साल से लटकी एक तस्वीर को मुद्दा बनाया गया। किरदार थे देश के बंटवारे के लिए जिम्मेदार इकलौते शख्स तो नहीं पर हां, सबसे प्रमुख शख्स, मोहम्मद अली जिन्ना। कुछ लोगों में स्वप्नरोष का वायरस इस इंजेक्शन के ज़रिए डाला गया कि दो राष्ट्र की थ्योरी देनेवाले, देश को बांटनेवाले, बंटवारे की वजह से हुई लाखों मौतों के जिम्मेदार व्यक्ति की तस्वीर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में क्यों टंगी है। देश को ऐसे लोगों से खतरा है जो रहते यहां है लेकिन पाकिस्तान के जनक जिन्ना को अपने दिल में रखते हैं… इंजेक्शन ने असर दिखाना शुरु किया और गुस्सा उस बुखार की तरह बढ़नेलगा जिसमें सोचने की शक्ति खत्म हो जाती है।
ऐसा ही एक इंजेक्शन कुछ और लोगों को दिया गया और उन्हें समझाया गया कि जिन्ना की तस्वीर तो बहाना है और निशाने पर देश के मुसलमान हैं और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी है। यानि उन लोगों के अस्तित्व को खतरा है। इंजेक्शन पड़ते ही स्वप्नरोष का वायरस उधर भी फैलने लगा.. और गुस्सा दूसरी तरफ भी उबाल मार रहा है।

यानि एक तरफ़ मुल्क को खतरे का खौफ, दूसरी तरफ अस्तित्व को खतरे का खौफ..और बाद में गुस्से का गुबार ।
अब सवाल ये है कि स्वप्नरोष का ये वायरस फैला कौन रहा है?
ये वायरस चुनावी मौसम में तेजी से फैलता है। ऐसे में समझना मुश्किल नहीं कि कौन फैला रहा है और क्यों।

इसका इलाज क्या है?
इसका सीधा और सरल इलाज है खुद का डॉक्टर खुद बनें। स्वप्नरोष की ये बीमारी आपकी तर्क करने की क्षमता को कुठाराघात पहुंचाती है। इसलिए अपना डॉक्टर खुद बनिए औऱ खुद से कुछ सवाल पूछिए… मसलन –
1) जिन्ना की तस्वीर 80 साल से टंगी थी तो आज ही हंगामा क्यों हुआ… और तस्वीर के हटने से देश में क्या बदल जाएगा? क्या किसानों की समस्या खत्म हो जाएगी, क्या बेरोज़गारी खत्म हो जाएगी… क्या देश में गरीबी खत्म हो जाएगी.. वगैरह वगैरह
2) जिन्ना ने अगर टू नेशन थ्योरी दी थी तो उनसे कहीं पहले ये थ्योरी सावरकर ने दी थी। क्या देश में जहां जहां भी सावरकर की तस्वीर है वो हटाई जाएगी और अगर हटाई भी जाएगी तो उससे क्या हासिल होगा?
3) अगर जिन्ना इस देश के विलेन हैं तो अंग्रेज़ों को देश से खदेड़ भगाने के लिए शुरु हुए ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ की मुखालफत करनेवाले और उसके दमन में अंग्रेज़ों का साथ देनेवाले श्यामा प्रसाद मुखर्जी की तस्वीर भी देश में हर जगह से हटाई जाएगी?
4) जिन्ना से इतनी ही नफरत है तो 2015 में बॉम्बे हाइकोर्ट म्यूज़ियम के उद्घाटन कार्यक्रम में गए पीएम मोदी ने वहां मौजूद जिन्ना के बैरिस्टर सर्टिफिकेट को क्यों नहीं फिंकवा दिया?
5) जिन्ना की तस्वीर देखकर अगर देश के लोगों पर बंटवारे के वक्त हुए अत्याचार की याद ताज़ा हो जाती है तो क्या उन तमाम लोगों के परिवार को ढूंढ ढूंढकर देश से निकाल दीजिएगा जो अंग्रेजों के शासनकाल में उनकी पुलिसफोर्स का हिस्सा थे और कभी जनरल डायर के इशारे पर अपने ही भारतीय भाई बहनों का खून बहाया था तो कभी किसी और जनरल के कहने पर लाठियां बरसाई थीं, अत्याचार किए थे?
6) अगर जिन्ना देश के बंटवारे के गुनहगार हैं और उनकी तस्वीर हटानी जरुरी है तो देश के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या करनेवाले गोडसे की मूर्ति या मंदिर को तोड़ दिया जाएगा?

इसी तरह दूसरी तरफ़ जिन छात्रों और मुसलमानों में स्वप्नरोष का वायरस घर कर गया है वो भी पूछें कि-
1) जिन्ना अगर उनका हीरो नहीं है तो उनकी तस्वीर को यूनिवर्सिटी में टांगकर क्या हासिल होगा?
2) अगर मुल्क से बड़ा कोई नहीं तो जिन्ना कैसे? अगर जिन्ना की वजह से इस देश में भाई-भाई के बीच दरार आ रही है तो जिन्ना जरुरी है या अपना हमवतन भाई?
3) उज्जवला योजना से लेकर देश की ऐसी कौन सी योजना है जिसका लाभ मुसलमानों को नहीं मिल रहा और सिर्फ हिन्दुओं को मिल रहा है या फिर क्या अलीगढ़ यूनिवर्सिटी को ऐसा क्या नहीं मिल रहा जो देश की बाकी सारी यूनिवर्सिटी को मिल रहा है जिससे ये समझा जाए कि जिन्ना की तस्वीर के बहाने उनपर हमला हो रहा है?

इन सवालों के जवाब तर्क के साथ ढूंढिएगा तो मन में ख्याल आएगा कि जिन्ना इस देश के विलने तो हैं लेकिन उनकी तस्वीर को लेकर आज 2018 में विवाद का कोई मतलब नहीं। देश में और भी मुद्दे हैं, और भी वजहें हैं जिनके लिए गुस्सा पैदा किया जाए तो बेहतर हो सकता है। देश में बलात्कार के मुद्दों पर गुस्सा आकर चला जाता है, उसे जिन्दा रखकर परिस्थिति को बदलने की कोशिश क्यों नहीं करते हम… दफ्तर में किसी के साथ गलत होता देखकर उसके लिए क्यों हक की लड़ाई नहीं लड़ते हम… बच्चों से सड़क पर भीख मंगवानेवालों को लेकर क्यों गुस्सा नहीं आता हमें… या और भी कई मुद्दे हैं… लेकिन हम पड़े हैं कभी जिन्ना की तस्वीर के पीछे तो कभी भारतमाता की जय बोलवाने की पीछे।
सोचिए… क्या कर रहे हैं.. क्यों कर रहे हैं.. और जब तक नहीं सोचिएगा.. यूं ही स्वप्नरोष से पीड़ित रहिएगा।
गेट वेल सून … GET WELL SOON.

पत्रकारिता के ‘मसीहानंद’ और उग्र ‘हिंदू’ भीड़ की स्क्रिप्ट !!

दृश्य 1: बाबा मसीहानंद अपने आसन पर बैठा है। लड़की ठीक उसके सामने घबराई सकुचाई बैठी है। मसीहानंद ने लड़की को कहना शुरु किया है कि घबराने की ज़रुरत नहीं है, ऊपरवाला सब देखता है और अच्छे लोगों के साथ बुरा नहीं होता। लेकिन चौथी ही लाइन में मसीहानंद लड़की को डराने लगता है कि दुनिया में कैसे जिस्म के भूखे भेड़िए घूम रहे हैं.. हर तरफ़ लड़कियों का बलात्कार हो रहा है.. उसकी आबरु भी खतरे में है। और फिर वो लड़की को कमरे में ले जाता है। लड़की को अपनी आगोश में ले लेता है। लड़की घबरा जाती है, पूछती है कि ये तो गलत है। बाबा मसीहानंद बताता है कि गलत तो वो है जो बाहर हो रहा है, यहां तो वो उसकी आगोश में सुरक्षित है.. वो तो उसका भला चाहता है। जो वो कह रहा है वही सत्य है और लड़की को खुद को उसे समर्पित कर देना चाहिए।

दृश्य 2: पत्रकारिता के मसीहानंद अपनी कुर्सी पर बैठ चुके हैं। दर्शक टीवी के सामने घबराया सकुचाया बैठा है। पत्रकारिता के मसीहानंद ने दर्शकों को बताना शुरु किया है कि कैसे हिंदू-मुसलमान को लड़ाने की साज़िश हो रही है जबकि समाज एक है और कोई किसी का बुरा नहीं चाहता। लेकिन चौथी ही लाइन में मसीहानंद दर्शकों को डराने लगता है कि देश में कैसे एक भीड़ पैदा हो गई है। कैसे हिंदुओं की ये भीड़ आतुर बैठी है हमला करने को। कोई है जो आपके लड़के को उस हिंदू भीड़ का हिस्सा बना रहा है। दर्शक घबरा जाता है। लेकिन वो मन में सोचता है कि उसका सामना तो ऐसी भीड़ ने नहीं हुआ अभी तक। पर मसीहानंद उसे समझाता है कि देश का सच वही है जो पत्रकारिता का मसीहानंद समझा रहा है। वो दर्शकों का भला चाहता है और इसी लिए हिंदू भीड़ और उसके आतंक से आगाह कर रहा है। जो वो कह रहा है वही सत्य है और दर्शक को खुद को उसे समर्पित कर देना चाहिए।
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सवाल– पत्रकारिता के मसीहानंद एक तरफ तो हिंदू-मुसलमान को भाई बताते हैं, समान बताते हैं लेकिन दूसरी तरफ भीड़ को हिंदू-मुसलमान में क्यों बांटते हैं? इस उग्र हिंदू भीड़ की ज़मीन क्यों तैयार कर रहे हैं? उसका डर क्यों पैदा कर रहे हैं?

जवाब– सब जानते हैं कि भीड़ भीड़ होती है। चाहे वो श्रीनगर में मस्जिद के बाहर एक पुलिस अफसर को पीट पीटकर मार देनेवाली भीड़ हो या फिर यूपी में अखलाक की जान ले लेने वाली भीड़। लेकिन क्यों कुछ लोग श्रीनगर वाली भीड़ को सिर्फ हिंसक भीड़ और यूपी वाली भीड़ को उग्र हिंदू भीड़ के बीच बांट देते हैं? 85 करोड़ हिन्दुओं की आबादी वाले मुल्क में 100-50 या कुछ हजार लोग पूरे हिन्दू समाज का चेहरा कैसे हो सकते हैं? प्रतिशत निकालिएगा तो .001% भी नहीं होंगे लेकिन बीते कुछ साल से एक उग्र हिंदू भीड़ आपके आसपास हमले के लिए तैयार बैठी है कि स्क्रिप्ट इसलिए लिखी जा रही है ताकि समाज बंट सके। बंट सके उस अनदेखे डर के नाम पर जिसको जानबूझकर बार बार दिखाने की कोशिश की जा रही है। मुसलमान को ये लगे कि उसके लिए मौजूदा सरकार खतरा है, अगर यही सरकार लौटी तो ये उग्र हिंदू भीड़ इतनी बड़ी हो जाएगी कि उसका रहना मुश्किल हो जाएगा और यही वो डर है जो मुस्लिम वोट बैंक को सरकार के खिलाफ़ एक जुट कर सकता है। इतना ही नहीं, हिंदूओं का बड़ा लिबरल वर्ग भी इस डर से भर सकता है कि वाकई उनका बच्चा उग्र भीड़ का हिस्सा न बन जाए और हिन्दुओं का वो वोट भी मौजूदा सरकार के पक्ष में जाने से रुक जाए। ऐसे में इस पूरे डर को पैदा करने की वजह हिंदू मुसलमान को आमने सामने खड़ा कर देना है ताकि 2019 में सियासी समीकरण पलट सके और इन मसीहानंदों के राजनीतिक आकाओं को फायदा पहुंच सके।

सवाल– तो क्या ये सच नहीं कि 2014 के बाद से ही हिन्दू-मुसलमान के बीच टकराव बढ़ गया है?

जवाब– नहीं। इस मुल्क में हिन्दू-मुसलमान हमेशा से मिलकर रहने के बावजूद गाहे बगाहे टकराते भी रहे हैं। बीते 50 सालों में (1967-2017) इस देश ने 58 बहुत बड़े दंगे देखे हैं जिनमें 12,828 लोगों की जान गई है। इतना ही नहीं, बीते 50 सालों में 17 ऐसे दंगे जिनमें 100 से ज्यादा लोगों की जानें गई हो उनमें से 9 कांग्रेस और उसके गठबंधन शासित राज्यों में हुए, 4 दूसरी पार्टियों के राज में और 1 बीजेपी के राज में हुआ। कहने का मतलब ये कि इस देश में दंगों का भी इतिहास रहा है और दूसरी पार्टियों के राज में भी दंगे होने का इतिहास रहा है लेकिन आपको बीते कुछ वक्त से बार बार यही समझाया जाता रहा है कि देश में आजादी के बाद से अमन-चैन था और सारी हिंसा और टकराव साल 2014 के बाद से शुरु हुआ।

सवाल– क्या इस देश में मुसलमानों पर अत्याचार नहीं हुए?

जवाब– बिलकुल हुए। कांग्रेस के नेता सलमान खुर्शीद ने भी माना है कि कांग्रेस के दामन पर मुसलमानों के खून के धब्बे हैं। यानि अत्याचार हुए होंगे तभी तो खून के धब्बे लगे होंगे, चाहे जिस पार्टी पर लगें। लेकिन सच ये भी है कि इस देश में अत्याचार ‘सिर्फ’ मुसलमानों पर हो रहे हों ऐसा ही नहीं है। कश्मीरी पंडितों पर अत्याचार का भी खौफनाक इतिहास है। इतना ही नहीं आजादी के पहले चले जाइए तो बाबा साहब अम्बेडकर अपनी किताब (थॉट्स ऑन पाकिस्तान) में लिख चुके हैं कि कैसे 1920 में विद्रोह तो अंग्रेज़ों के खिलाफ था लेकिन हिन्दू महिलाओं का भी बलात्कार हुआ था.. 1924 में कोहाट में दंगे हुए तो 155 लोग मारे गए और हिंदुओं को शहर छोड़ना पड़ा था। यानि हिन्दू बहुसंख्यक भले हो लेकिन उसे भी अत्याचार सहने पड़े हैं। 1984 में सिखों ने जो सहा वो कौन नहीं जानता। दलित आज भी अत्याचार सह रहे हैं। यानि अत्याचार किसी एक के हिस्से ही नहीं आया इस मुल्क में और जो आपको ऐसा बताकर बरगला रहे हैं दरअसल वो भी आप पर अत्याचार कर रहे हैं क्योंकि उन्हें आपसे नहीं आपके वोट भर से मतलब है।

सवाल– क्या करना चाहिए फिर?

जवाब– पत्रकारिता के मसीहानंदों को पहचानिए। मनोविज्ञान में कहा गया है कि जिस चीज़ के लिए मना किया जाए इंसान सबसे ज्यादा वही करना चाहता है.. वैसे ही जब आपको हिंदू-मुसलमान के खेल से बचने के लिए बोलकर किसी उग्र हिंदू भीड़ से मिलवाया जा रहा होता है तो उस खेल से बचिए। ऐसे लोग न हिंदू के हैं, न मुसलमान के। रेप को हिंदू मुसलमान बनाते हैं तो देखिए क्या होता है… कोई रेप में ‘देवी-स्थान’ को ज्यादा अहमियत देने लगता है तो कोई मदरसे में हुए रेप को मुद्दा बनाने लगता है जबकि मुद्दा तो उस पीड़िता का दर्द होना चाहिए था। रेप कमरे में हो, देवी स्थान में या मदरसे में… रेप, रेप होता है। लेकिन कैसे आपको हिंदू मुसलमान के लिए तैयार कर दिया जाता है उसे समझिए। आज रेप पर हो रहा है कल किसी और मुद्दे पर होगा। बाहर निकलिए और देखिए, कैसे एक ही ऑफिस में हिंदू भी काम कर रहा है और मुसलमान भी। मिलकर रहिएगा तो ऐसे लोगों से बच पाइएगा। चंद मुसलमान आतंकी हर मुसलमान को आतंकी नही बना सकते तो चंद हिंदुओं का कुकृत्य हर हिंदू को मुसलमान के खिलाफ नहीं दिखा/बता सकता। सोचिएगा।

काला हिरण नहीं, सज़ा का मकसद भी ‘विलुप्त’ हो रहा है !!

दुनिया के किसी भी हिस्से में चले जाइए या फिर इतिहास के किसी भी युग को खंगाल लीजिए, किसी को भी सज़ा दी गई है तो उसके पीछे एक ‘मकसद’ रहा है। यहां तक की घर में किसी बच्चे तक को पढ़ाई न करने पर या शैतानी करने पर मां-बाप कोई सज़ा देते हैं तो उसका भी एक मकसद होता है कि बच्चा सुधर सके या संस्कार सीख सके या शैतानी न करे। कभी सुना है कि 5 साल के एक बच्चे ने खिलौना तोड़ देनेवाले मोहल्ले के एक दूसरे बच्चे को थप्पड़ मारा हो तो उसके मां-बाप ने 20 साल बाद (जब बच्चा 25 साल का समझदार युवक है) उस बच्चे को पीटा हो और खाना पीना बंद कर दिया हो या सज़ा के तौर पर घर से निकाल दिया हो कि तूने उस बच्चे को क्यों मारा था? लेकिन हमारे देश की न्याय व्यवस्था में फैसलों में जो देरी होती है उसमें कमोबेश सज़ा देने का मकसद कुछ यूं हीं खत्म हो जाता है। सच है कि अदालतों में पहुंचनेवाले मामले इस उदाहरण से कहीं ज्यादा संगीन होते हैं लेकिन सज़ा का मकसद तो तब भी सज़ा सुनाने के पीछे होता ही है।
सलमान खान को काले हिरण के शिकार मामले में 20 साल बाद ट्रायल कोर्ट से सज़ा हुई है। संभवत: सलमान खान को एक दो दिन में जमानत मिल जाएगी और मामले का सेशन कोर्ट, फिर हाईकोर्ट, फिर सुप्रीम कोर्ट और फिर रिव्यू पिटीशन की सीढ़ियां चढ़ते चढ़ते दम फूल जाएगा लेकिन मैं बस समझना चाहता हूं कि इस वक्त सलमान ख़ान को 5 साल जेल में रखने की सज़ा का मकसद इनमें से क्या है–

1. सुधार-
कायदे से सोचिएगा तो जेल को एक सुधार गृह ही होना चाहिए जहां वो शख्स जो अपनी आपराधिक छवि की वजह से समाज के बीच रहने लायक न हो, वो जाए.. सज़ा काटे.. सुधरे और फिर समाज की मुख्य धारा से जुड़ जाए। हांलाकि अमूमन ऐसा होता नहीं है। या तो जेल जाने वाले कई लोग ज्यादा शातिर अपराधी बनकर निकलते हैं या फिर सुधरकर भी मुख्यधारा का हिस्सा नहीं बन पाते। खैर, वो बात अलग है.. मेरा सवाल ये है कि अगर सलमान खान को सज़ा देने का मकसद उस व्यक्ति को सुधारना है जो नियमों को ताख़ पर रखता है और काले हिरण जैसे संरक्षित जीव को मार देता है तो वो मकसद आज कैसे पूरा होगा? क्या 32 साल की उम्र वाला, गर्म खून.. स्टारडम के जोश और मेरा कोई क्या बिगाड़ लेगा की सोचवाला सलमान खान आज 52 साल की उम्र में भी वही सलमान खान है? सलमान खान को छोड़िए, सिर्फ अपने आप से एक बार पूछिए कि क्या आप 5 साल वाले खुद में और आज के खुद में अंतर नहीं पाते? तो इस सज़ा से आप किस सलमान को सुधारेंगे? उस सलमान को जो पहले ही हज़ारों लोगों को बिइंग ह्यूमन के ज़रिए मदद पहुंचा रहा है या फिर उस सलमान को जो सैंकड़ों बच्चों की पढ़ाई का पूरा खर्च उठा रहा है?

2. समाज में रहने लायक नहीं-
क्या सलमान को आज 20 साल बाद जेल में कैद करने का मकसद ये हो सकता है कि वो इतने खूंखार या आपराधिक छवि के हैं कि समाज में रहने लायक नहीं? सलमान को करीब से जानने वाला शख्स हो या बड़े पर्दे पर देखकर उनसे जुड़नेवाला शख्स.. कोई भी ये नहीं मान सकता कि सलमान इतने खूंखार हैं कि समाज में रहने लायक नहीं। शायद कभी थे भी नहीं। तो फिर एक ऐसे शख्स को जो कमाता है तो लोगों पर खर्चता भी है उसे जेल में डालकर क्या हासिल होगा? क्या कोई है जो आज ताल ठोक कर ईमानदारी के साथ ये कहे कि सलमान खान को फौरन जेल में डालो, ये समाज में रहने लायक नहीं? एक मिनट भी बाहर रहा तो पूरे सिस्टम को खराब कर देगा?

3. पीड़ित को न्याय-
20 साल बाद किस पीड़ित को न्याय मिलेगा? काले हिरण के शिकार मामले में कोई कह सकता है कि एक जानवर को क्या न्याय मिलना पर मैं ऐसा नहीं मान सकता। जीने का अधिकार सबका है तो उस अधिकार में हनन करने के खिलाफ न्याय मिलना भी अधिकार सबका है। इतना ही नहीं, जो बिश्नोई समाज प्रकृति और जानवरों को पूजता है ये मसला उसको न्याय मिलने का भी है। लेकिन 20 साल बाद? वो भी न्याय कितने दिन का? 2 दिन या 3 दिन… क्योंकि आज नहीं तो कल जमानत मिल ही जाएगी.. और फिर ऊपरी अदालतों के चक्कर का सिलसिला शुरु होगा… जिन लोगों ने न्याय की लड़ाई शुरु की होगी उनमें से कितने जिन्दा बचेंगे तब तक ये भी नहीं पता। जिस तेज़ी से काले हिरणों की संख्या घट रही है, सलमान को सज़ा मिलते मिलते तक वो संरक्षित प्रजाति से विलुप्त प्रजाति में तब्दील हो जाएंगे या नहीं इसकी भी गारंटी नहीं। फिर ये किसके न्याय की लड़ाई लड़ी जा रही है या बची है? वक्त बीता तो राजीव गांधी के हत्यारों तक को माफ़ कर दिया प्रियंका और राहुल गांधी ने। उनके जख्म तो वक्त और समझ ने भर दिए लेकिन ज्यादातर मामलों में तो न्याय का इंतज़ार ही न्याय पाने के उत्साह और मकसद को लील जाता है।

4. समाज को संदेश-
सलमान खान को जेल में डाल देने से अगर काले हिरण का शिकार रुक जाए तो मैं तो कहता हूं आजीवन डाल दीजिए। लेकिन ऐसा होगा नहीं, लिखित में ले लीजिए। 1998 से 2018 के इन बीस सालों में काले हिरण सलमान खान की वजह से ही सबसे ज्यादा चर्चा में रहे लेकिन बावजूद इसके न तो उनका शिकार बंद हुआ और न उनकी संख्या बढ़ी। संजय दत्त को हथियार रखने के मामले में सज़ा मिल जाने से युवाओं को संदेश मिल गया होता तो या तो देश में अपराध कम हो गया होता या फिर युवा आतंकी न बन रहे होते।

एक बात बहुत साफ कर दूं कि मेरे कहने का मकसद ये कतई नहीं कि दोषी को सज़ा न हो। बिलकुल हो। सलमान हो, संजय दत्त या कोई भी ए, बी, सी… दोषी है तो सज़ा ज़रुर हो लेकिन कहना बस ये चाहता हूं कि ऊपर जो मकसद गिनाए हैं वो सारे तब ही पूरे हो सकते हैं जब सज़ा ‘समय’ पर हो। अदालतों में करोड़ों मामले लंबित हैं… जजों के पद खाली हैं… लोग अदालतों के चक्कर पर चक्कर लगा रहे हैं और सबकुछ एक चक्र की तरह बस चल रहा है… सज़ा क्यों मिल रही है.. क्या मकसद है.. किसी को नहीं पता… लोग अदालतों में उम्मीद के साथ जाते हैं… पर उम्मीद के उस चेहरे पर भी झुर्रियां पड़ जाती हैं सालों साल के इंतज़ार से। सलमान खान और संजय दत्त के मामले इस बात को चीख चीखकर कह रहे हैं कि देश की न्याय व्यवस्था को सुधारिए… कोर्ट बनाइए.. जज लाइए… सिस्टम को तेज़ कीजिए.. काले हिरण के विलुप्त होने की चर्चा तो कर रहे हैं लेकिन विलुप्त होते सज़ा के ‘मकसद’ की भी चर्चा कीजिए।

अभिनेत्री स्वरा भास्कर को सिर्फ ‘वजाइना’ (योनि) से ‘पूरी नारी’ में बदलने वाला पोस्ट पढ़ा आपने?

((नज़र नज़र का फर्क होता है और सोच सोच का भी। जिस पद्मावत को देखकर अभिनेत्री स्वरा भास्कर बतौर महिला ‘वजाइना’ यानी योनि से ज़्यादा कुछ महसूस नहीं कर पायीं उसी फ़िल्म में एक नारी के बुद्धि, साहस, अभिमान, पराक्रम और निर्णय क्षमता को कैसे बखूबी दिखाया गया है वो मेरे सहयोगी सुधीर के इस पोस्ट से समझिए। उम्मीद है स्वरा तक भी ये पोस्ट पहुंचेगा और उनकी सोच योनि से आगे बढ़ पाएगी।))

प्रिय स्वरा भास्कर जी ,

आपकी ‘वैजाइना’ (योनि) वाली चिट्ठी पढ़ी जो आपने ‘पद्मावत’ देखने के बाद संजय लीला भंसाली को लिखी है… आपका ‘योनि’ वाला खत पढ़ने के बाद मैं भी फिल्म देखने गया… फिल्म देखने के बाद आपके पत्र के संदर्भ में जो मुझे लगा वो आपको प्रेषित करता हूं…

आपने लिखा है कि पद्मावत देखने के बाद आपको लगा की आप ‘योनि’ से ज्यादा कुछ नहीं…आपका आरोप है की फिल्म में पद्मावती को सिर्फ उसकी पवित्रता के आसपास केंद्रित रखा गया है…इससे ज्यादा पद्मावती में कुछ नहीं…ये आपने महिलाओं के संदर्भ में कहा है… लेकिन मैं आपके इस आरोप को निराधार मानता हूं… मैं ऐसा क्यों बोल रहा हूं इसे सिलसिलेवार तरीके से फिल्म को आधार बनाकर समझाता हूं… फिल्म को आधार बनाकर इसलिए क्योंकि जाहिर है आपने भी फिल्म देखने के बाद ही टिप्पणी की है… तो इधर उधर की बात ना करके सीधा फिल्म के दृश्यों पर आते हैं…

1- आपको पद्मावत में सिर्फ ‘योनि’ दिखी जबकि आप भूल गई फिल्म के पहले ही दृश्य में जहां पद्मावती की एंट्री होती है… सिंघल देश की राजकुमारी अकेले जंगल में शिकार करने गई थी… क्या आपको ये शौर्य नहीं दिखता… जंगल में अकेले शेर का शिकार करने गई राजकुमारी का साहस आपको ना दिखा…लेकिन आपको दिखी तो योनि…

2- फिल्म में राजकुमारी पद्मावती ने पिता की सहमति से पहले ही अपना वर चुन लिया था… क्या ये एक राजकुमारी की आधुनिक सोच नहीं थी… जो पिता की सहमति से पहले ही अपना वर चुन चुकी थी… अगर ये अधिकार आज भी सब लड़कियों को मिल जाए तो समाज में कितना सकारात्मक बदलाव हो जाएगा…लेकिन ये आपको ना दिखा… सिंघल देश से हजारों किलोमीटर दूर अपने वर के साथ चित्तौड़ आ जाना… क्या ये पद्मावती का साहस नहीं दर्शाता ?…लेकिन आपको दिखी तो सिर्फ योनि…

3- फिल्म में पद्मावती का सामना जब कुटिल पुरोहित से होता है तो रानी अपने सौंदर्य की जगह बुद्धि को चुनती है… वो पुरोहित के हर सवाल का तर्क से साथ जवाब देती है… आपको पद्मावती की बुद्धि नजर ना आई…उसकी तर्क शक्ति नजर ना आई… नजर आई तो सिर्फ योनि…

4- जब राजा रतन सिंह और पद्मावती एकांत में होते हैं और पुरोहित उनका एकांत भंग करता है तो एक खास संदेश दिया गया… राजा तो पुरोहित को जेल की सजा सुनाते हैं लेकिन पद्मावती के कहने पर उसे देश निकाला दिया जाता है… शायद ही आपने कभी सुना हो किसी राजा ने रानी के कहने पर शाही फैसला बदल दिया लेकिन पद्मावत में ऐसा होता है… फिल्म में राजा रतन सिंह तो एक पल की देरी नहीं करते…राजा के फैसले में रानी की सहमति देखने को मिलती है… बराबरी देखने को मिलती है…. लेकिन आपको दिखी तो सिर्फ योनि…

5-जब राजा रतन सिंह खिलजी को महल में आने की मंजूरी देते हैं तो उसका विरोध सिर्फ और सिर्फ पद्मावती ने किया था… जैसा पद्मावती ने कहा ठीक वैसा ही हुआ… खिलजी ने राजा की शर्त मान ली… पद्मावती की आशंका सच जाहिर हुई… यहां पद्मावती की दूरदर्शिता दिखाई देती है लेकिन आपको दिखी तो सिर्फ योनि…

6- खिलजी जब रानी को देखने की इच्छा जाहिर करता है तो सबका विरोध कर रानी खुद को पेश करने का फैसला लेती हैं… इससे साफ पता चलता है सारे दरबार की राय पर रानी पद्मावती का निर्णय भारी पड़ा … एक रानी की बात सबने सुनी और मानी…. यहां आपको रानी के फैसले की धमक सुनाई ना दी…आपको दिखाई दी तो सिर्फ योनि…

7- जब खिलजी रतन सिंह का अपहरण कर लेता है तो पद्मावती ने गजब की चाल चली… हजारों किलोमीटर दूर से कुटिल पुरोहित का सिर कटवा दिया… ऐसी चाल तो आज के बड़े बड़े नौकरशाह नहीं चल पाते… उस वक्त के बड़े दरबारी बडे वजीर ऐसी बुद्धि नहीं लगा पाते थे… लेकिन आपको पद्मावती की कूटनीति ना दिखी…आपको दिखी तो सिर्फ योनि…

8-खिलजी ने जब राजा रतन सिंह का अपहरण किया तो पद्मावती ने ऐसा फैसला लिया जो इतिहास में ना पहले सुना गया ना बाद में… पद्मावती खुद खिलजी के महल में गईं… वीरता का परिचय देते हुए राजा रतन सिंह को छुड़ा कर वापस लाती हैं… पूरे राज्य में राजा से ज्यादा रानी की जयजयकार होती है…मुझे कोई एक उदाहरण बता दीजिए जहां रानी ने दुश्मन के किले में जाकर राजा को बचाया हो… इतिहास में इतना बड़ा कारनामा करने वाली सिर्फ एक रानी हुई पद्मावती…लेकिन आपको दिखी सिर्फ योनि…

अब फिल्म के सबसे विवादित हिस्से पर आते हैं… जौहर के हिस्से पर… आपने जौहर को आधार बनाकर आरोप लगाया की महिलाओं को जीने का हक है… महिलाएं पति के बगैर भी जिंदा रह सकती हैं… वो आजाद हैं… और बहुत कुछ… आपकी एक-एक बात से मैं हजार-हजार बार सहमत हूं… लेकिन वो आज से 800 साल पहले का समाज था…आज हालात बदल गए हैं… लेकिन यहां मामला कुछ और है… अब वो समझिए…

1- आपने जानबूझकर सती और जौहर को आपस में मिक्स किया… जौहर और सती में अंतर है… ये दोनों ही कुप्रथा थी जो वक्त से साथ खत्म हो गई और कलंक मिट गया…सती पति की मौत पर होता था जबकि जौहर युद्ध में हार के बाद होता था… दोनों ही कुप्रथा थी लेकिन जौहर मजबूरी में की जाती थी… सामूहिक फैसले से होता था… जबकि सती प्रथा समाज और परिवार के दबाव में… दोनों ही पाप थे… अच्छा हुआ बंद हुए…

2- आपने लिखा की पूरी लड़ाई योनि के पीछे हुई… लेकिन आप भूल गई… खिलजी को पद्मावति से प्रेम नहीं था… वो हवस थी…राजा रतन सिंह के पास कोई विकल्प था क्या ? आपको क्या लगता है पद्मावति अगर खिलजी को मिल जाती तो वो सम्मान की जिंदगी जीती…आप क्या ये कहना चाहती हैं की किसी दरिंदे के साथ बिना मर्जी के किसी महिला का रहना आजाद ख्याली है और राजा रतन सिंह को पद्मावति को दुश्मन को सौंप देना चाहिए था….

3- जौहर के हालात को आप जानबूझकर छिपा ले गई… बागों में बहार नहीं आई थी… हजारों आक्रमणकारी महल में प्रवेश कर चुके थे… या तो वो कत्ल करते या इज्जत लूटते… मृत्यु दोनों तरफ थी… मर कर भी मरना था और बचकर भी मरना था… खिलजी और उसकी सेना किसी को छोड़ने वाली नहीं थी… यहां पर राजपूत महिलाओं ने सम्मान के साथ मृत्यु को चुना…क्या उनके पास कोई दूसरा विकल्प था ? जब युद्ध में पारंगत योद्धा ना जीत सके तो खिलजी की विशाल सेना से कुछ महिलाएं कैसे जीत पाती… वो सनी देओल नहीं थी… प्रैक्टिल तरीके से देखेंगी तो खिलजी की दरिंदी सेना उन्हें नोच नोच कर खा जाती… वो खुद आग में कूद गई नहीं तो उनके साथ जानवरों से बदतर सलूक होता… हो सकता है आप उस वक्त कुछ और फैसला लेती…आप खुद को खिलजी के हवाले कर देती… वो आपका मत होता लेकिन राजपूत महिलाओं ने ऐसा नहीं किया… वो उनकी स्वतंत्रता थी… आज देखने में जौहर का वो फैसला रुढिवादी लगता है पर एक बार उस हालात को मद्देनजर रखिए… क्या राजपूत महिलाओं के पास सम्मान से जीने का कोई और विकल्प था…मृत्यु तो राजा की मौत के साथ ही निश्चित हो चुकी थी… क्योंकि 12वीं सदी में लोकतंत्र नहीं था राजशाही थी…इतिहास को इतिहास के नजरिए से देखना चाहिए…आपको हालात छिपाकर अपनी बात नहीं रखनी चाहिए थी…

4- संजय लीला भंसाली का विरोध करना मेरी समझ के परे है क्योंकि उन्होंने जो दिखाया वो लिखा हुआ है… उन्होंने तो अपनी तरफ से इतिहास गढ़ा नहीं… इस हिसाब से तो मुगले आजम से लेकर जोधा अकबर तक हर ऐतिहासिक फिल्म में निर्देशक अपने हिसाब से तोड़ मरोड़ कर सकता है लेकिन क्या ये इतिहास के साथ इंसाफ होगा ? आपने तो कुछ फिल्में की हैं…आपको तो मालूम होगा… इतिहास में जो जैसा लिखा है वैसा ही दिखाना होता है… क्योंकि आप उस दौर में नहीं थे… और आज बैठकर 800 साल पहले का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता… इसलिए ट्रिगर दबाने से पहले निशाना तो ठीक से लगा लिया होता…

5- आपने कहा की जौहर का महिमामंडन करने से देश में गलत संदेश जाएगा… अरे वाह.. एक सीरियल आया था बालिका वधू… उस सीरियल के हिट होने के बाद क्या बाल विवाह बढ़ गए थे… आपको क्या लगता है देश दुनिया को समझने की शक्ति सिर्फ आपके पास है…. आप आज के युवा को रील और रिएलिटी का फर्क ना समझाएं… हमको अच्छी तरह से मालूम है की मनोरंजन क्या है… पद्मावत देखने के बाद कोई जौहर या सती ना होगा ना कोई उकसाएगा इससे निश्चिंत रहिए… क्योंकि देश उस दौर से बहुत आगे निकल चुका है… इतिहास को जानना और इतिहास को समझना दो अलग चीजे हैं… आपने दोनों को मिक्स करके कुछ अलग ही परिभाषा गढ़ दी…

आपका प्रशंसक
सुधीर कुमार पाण्डेय

लघुकथा : लाभ का मद (अकाउंट)

ये कहानी उस शहर की है जिसका नाम था – बिनदेखलपुर। और यहां रहते थे ईमानदार साहब। ईमानदार साहब का बहुत नाम था। लोग मानते थे कि जैसा नाम था वैसी ही उनकी नीयत भी थी। शहर-शहर लोग चर्चा करते तो ईमानदार साहब के लिए एक ही बात कहते.. क्रांतिकारी, बहुत क्रांतिकारी।

बिनदेखलपुर भी अपनी रफ्तार से आगे बढ़ रहा था। पर अचानक वो दौर आया जब यहां काले धन का काला खेल शुरु हो गया। कमल बाबू और हस्तराम साहब पर आरोप लगने लगे कि वो और उनका पूरा कुनबा काला धन जमा कर रहा है। ईमानदार साहब ने क्रांति कर दी। दोनों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। लोगों का भी ईमानदार साहब में विश्वास बढ़ने लगा। लोगों को लगा कि ईमानदार साहब ही बिनदेखलपुर को काले धन की काली छाया से मुक्त कराएंगे।

पर अचानक एक दिन पता चला कि ईमानदार साहब के कुनबे के कुछ लोगों के पास ‘लाभ का मद(अकाउंट) ‘है। इसमें वो सारा पैसा रखा जाता है जो टैक्स चोरी से बचाया गया था। लोगों की भवें तन गईं कि ये कैसे संभव है। ये तो गलत है। पंचायत ने ईमानदार साहब के कुनबे के लोगों को लाभ का मद मामले में सज़ा सुना दी। ईमानदार साहब तिलमिला गए क्योंकि सवाल उनपर भी था और उनकी नीयत पर भी। उन्होंने फौरन पंचायत पर ही सवाल उठा दिए और लाभ के मद के बारे में लोगों के सामने आकर ये बातें कहीं-

1. लाभ का मद तो दरअसल लाभ का मद (अकाउंट) है ही नहीं क्योंकि इसमें सारा पैसा तो उन्हीं का है जिन्होंने उसे सरकार को न देकर खुद रख लिया। यानि पैसा तो उनका ही था.. सरकार से एक पैसा भी लिया नहीं, यानि लाभ हुआ नहीं तो वो अकाउंट लाभ का मद हुआ कैस? किसी ने ईमानदार साहब को समझाया कि ये तो टैक्स चोरी हुई, और ये भी काला धन ही हुआ… और इसलिए ये गलत है। लेकिन ईमानदार साहब नहीं माने।
2. ईमानदार साहब ने दूसरी अहम बात कही कि कमल बाबू और हस्तराम साहब के कुनबे के लोगों के पास भी तो लाभ का मद है जिसमें टैक्स चोरी का पैसा है। इसलिए उनकी गलती, गलती नहीं है। किसी ने बहुत समझाया कि आप तो कमल बाबू और हस्तराम साहब जैसे न थे और आपका गलत इसलिए तो सही नहीं हो जाता क्योंकि उन्होंने गलत कर रखा है। पर ईमानदार बाबू फिर नहीं माने।
3. किसी ने पूछा कि अगर लाभ के मद का पैसा गलत नहीं था तो अलग से तिजोरी मंगाकर उसे छिपाने की कोशिश क्यों की? वो तो तिजोरी की चाभी प्रमुख पंच ने देने से मना कर दी नहीं तो तिजोरी में सारा पैसा डालकर गायब कर ही दिया गया था। लेकिन ईमानदार साहब ने कह दिया कि ऐसा नहीं है, तिजोरी तो इसलिए लाई गई थी कि सारा पैसा एक जगह रहे और लाभ के मद का हंगामा ही न मचे। किसी ने पूछा यानि आप मान रहे हैं कि वो सारा पैसा लाभ के मद का था पर ईमानदार बाबू कहां मानने वाले थे। वो फिर इनकार कर गए। वो बार बार एक ही बात कहते कि पैसा तो सरकार से लिया ही नहीं, तो अपना पैसा कैसे लाभ का हो गया।
4. यही नहीं, ईमानदार साहब ने ये भी कह दिया कि पंचों ने तो उन्हें लाभ के मद के नोट दिखाने और अपनी बेगुनाही साबित करने का मौका ही नहीं दिया। पंच तक हैरान थे कि उन्होंने तो कई बार चिट्ठी भिजवाई लेकिन ईमानदार बाबू और उनके कुनबे के लोग डाकिये से चिट्ठी तो ले लेते लेकिन कभी मिलने ही नहीं आते। ऐसे में उनका नाम घसीटना कहां तक सही था।

खैर, कुल मिलाकर हुआ ये कि बिनदेखलपुर के लोग जहां ईमानदार बाबू से उम्मीद लगाए बैठे थे कि वो कमल बाबू और हस्तराम साहब से इतर शहर को बदलकर रख देंगें, वही ईमानदार बाबू अब खुद बदले बदले से लगने लगे थे। पर लोग करते भी तो क्या, उनके पास विकल्प ही क्या था।
बिनदेखलपुर वो सब देख चुका था जो उसने देखने की उम्मीद शायद ही की थी।

(डिसक्लेमर: इस लघुकथा- ‘लाभ का मद’ का लाभ के पद मामले से अगर आपको कोई मेल लग रहा है तो ये आपकी कलप्ना का हिस्सा है। और अगर आपको लगता है कि ईमानदार बाबू के जवाब, आम आदमी पार्टी के लाभ के पद के मामले में दिए उन जवाबों से मेल खाते हैं जिसमें कहा गया कि लाभ का पद तो लाभ का पद है ही नहीं क्योंकि कोई पैसा नहीं लिया गया, लाभ का पद हटानेवाला संशोधन बिल इसलिए लाया गया ताकि ये परेशानी ही खत्म हो, दूसरे राज्यों में भी तो है लाभ का पद और चुनाव आयोग ने तो हमें सुना ही नहीं… तो ये आपकी सोच है, मैं क्या कर सकता हूं।)

पद्मावती होतीं तो करणी सेना से ये सवाल ज़रुर पूछतीं!

– 18 से 44 साल की लड़कियों/महिलाओं से सबसे ज्यादा रेप इस राज्य में होते हैं।
– यहां हर रोज़ औसतन 10 रेप की वारदातें होती हैं।
– इस राज्य में हर दूसरी महिला अनपढ़ है।
– 20 से 24 साल की लड़कियों में हर तीसरी लड़की की शादी 18 साल से कम उम्र में हुई है इस राज्य में।
– इस राज्य में 15-19 साल की लड़कियों में करीब हर 16वीं लड़की या तो मां बन चुकी है या गर्भवती हुई है।
– यहां हर 1000 लड़कों पर सिर्फ 888 लड़कियां हैं।

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हार्दिक पटेल पाटीदार आरक्षण के नाम पर ‘गंजे को कंघी बेचने’ का काम कर रहे हैं?

गंजे को कंघी बेचनेवाली कहावत का सीधा सरल मतलब होता है कि किसी को हसीन ख्वाब दिखाना, मूर्ख बनाना और अपना काम निकाल लेना। राजनीति में ये बहुत होता है और आजकल कमोबेश यही काम पाटीदार नेता हार्दिक पटेल कर रहे हैं।

हार्दिक पटेल गुजरात चुनाव में कांग्रेस पर दांव लगा रहे हैं और ऐलान कर रहे हैं कि कांग्रेस सत्ता में आई तो पाटीदारों को आरक्षण मिलेगा।
सवाल है कि कैसे मिलेगा आरक्षण? गुजरात में पहले से 49.5 फीसदी आरक्षण है और 1992 की इंदिरा साहनी केस में सुप्रीम कोर्ट का फैसला है कि आरक्षण की सीमा 50 फीसदी की दायरे को नहीं लांघनी चाहिए। फिर अगर सत्ता में कांग्रेस हो या बीजेपी, आरक्षण मिलेगा कैसे? और वो भी तब जब हार्दिक पटेल कह रहे हैं कि कांग्रेस पार्टी सत्ता में आने पर OBC या SC/ST को मिले आरक्षण से कोई छेड़छाड़ नहीं करेगी?

सीधा और सरल जवाब ये है कि हार्दिक पटेल और कांग्रेस पार्टी पाटीदारों को आरक्षण का वो सपना दिखा रही है जो पूरा होना बहुत ही मुश्किल है।
ऐसा कहने के पीछे का तर्क समझिए-

1. हार्दिक पटेल कह रहे हैं कि कांग्रेस सत्ता में आई तो आर्टिकल 46 में संशोधन करके आरक्षण दिया जाएगा। सबसे पहली बात तो आर्टिकल 46 कोई बाध्य करनेवाला कानून नहीं बल्कि एक दिशा निर्देश भर है। ऐसे में आरक्षण देने के लिए बिल लाया भी गया तो भी उसका अदालत में टिकना मुश्किल होगा क्योंकि 50 फीसदी से ज्यादा आरक्षण देने की दूसरे राज्यों की कोशिशें अदालतों में औंधे मुंह ही गिरी हैं।

2. कोशिश का दूसरा तरीका हो सकता है कि पाटीदारों को आरक्षण देने के लिए राज्य सरकार कानून लाए और फिर उसे केन्द्र सरकार संविधान की 9 वीं अनुसूची में डाल दे। इसमें भी दो पेंच हैं लेकिन उन पेंचों को समझने के पहले ये समझना जरुरी है कि 9वीं अनुसूची में कानून डालने से होगा क्या।

क्या है संविधान की 9वीं अनुसूची?

– संविधान के आर्टिकल 31B के मुताबिक 9वीं अनुसूची मेें डाला गए किसी भी कानून को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती। यानि यूं समझिए कि अगर पाटीदार आरक्षण का कानून बनाकर 9वीं अनुसूची में डाल दिया जाए तो आरक्षण की 50 फीसदी की सीमा के पार होने के बावजूद उसे अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकेगी।

लेकिन यहीं पर दो पेंच सामने आकर खड़े हो जाते हैं।

पहला पेंच तो ये कि केन्द्र में बीजेपी की सरकार है। पाटीदारों को आरक्षण देने का राजनीतिक लाभ वो कांग्रेस को क्यों उठाने देगी और इसलिए विधानसभा में कानून पास भी हुआ तो केन्द्र के स्तर पर अटक जाएगा।

दूसरा सबेस बड़ा और महत्वपूर्ण पेंच ये है कि 24 अप्रैल 1973 के केशवानंद भारती जजमेंट के मुताबिक 9वीं अनुसूची में दाखिल कानून को भी अदालत में चुनौती दी जा सकती है और साथ ही 11 जनवरी 2007 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक भी 9वीं अनुसूची में शामिल किसी कानून को अदालत में चुनौती दी जा सकती है और अगर वो कानून समानता के मूल अधिकारों का उल्लंघन करता पाया गया तो अदालत उसे निरस्त भी कर सकती है।

यानि बहुत साफ है, पहला तो ये कि पाटीदारों को आरक्षण देने के लिए केन्द्र का साथ मिलना मुश्किल है औऱ दूसरे ये कि अगर बीजेपी राज्य के आरक्षण देने के कानून को 9वीं अनुसूची में शामिल करने को तैयार भी हो गई तो भी उसे अदालत में चैलेंज किया जा सकेगा और वहां उसका टिकना बहुत मुश्किल होगा।

अदालत में पाटीदारों के आरक्षण के टिकने की मुश्किलात की एक बड़ी वजह है इसके पहले दूसरे राज्यों की ऐसी कोशिशों का औंधे मुंह गिरना।

कब कब अदालतों ने ठुकराया 50 फीसदी से ज्यादा आरक्षण-

– 2014 में कांग्रेस-एनसीपी सरकार ने महाराष्ट्र में मराठों को 16 फीसदी आरक्षण दिया लेकिन महाराष्ट्र में मराठों के आरक्षण पर मुंबई हाईकोर्ट ने रोक लगा दी थी

– हरियाणा में कांग्रेस सरकार ने जाटों को आरक्षण देने का एलान किया था। हरियाणा में जाट आरक्षण को चंडीगढ़ हाईकोर्ट ने असंवैधानिक करार दिया

– राजस्थान में गुर्जरों को 5 फीसदी आरक्षण देने का आदेश भी हाईकोर्ट रद्द कर चुका है।

– अप्रैल 2016 में गुजरात सरकार ने पाटीदार और अन्य जातियों को 10 फीसदी आरक्षण दिया था लेकिन गुजरात हाईकोर्ट ने पाटीदारों और अन्य जातियों के 10 फीसदी आरक्षण को रद्द कर दिया।

तमिलनाडू में आरक्षण का दायरा 69 फीसदी तक पहुंच चुका है लेकिन वो सुप्रीम कोर्ट के 1992 में आरक्षण की सीमा 50 फीसदी तय करने से पहले की बात है।

ऐसे में सवाल ये है कि हार्दिक पटेल क्या झूठ की स्याही से जीत की इबारत लिखना चाह रहे हैं या फिर कांग्रेस के झांसे में आ गए हैं?

जवाब जो भी हो, इतना तो तय है कि पाटीदारों को आरक्षण का गणित समझना चाहिए और फिर कुछ सवाल अपने ही नेताओं से पूछने चाहिए।

वसुंधरा सरकार के ‘गैरकानूनी’ कानून पर मोदी की चुप्पी और कांग्रेस के अनैतिक विरोध की वजह

शाही परिवारों की रियासत और लोकतंत्र की सियासत का एक फर्क ये होता है कि रियासतों में राजा का ‘हुक्म’ हीं सबकुछ होता है और लोकतंत्र में जनता ही राजा होती है और वहां चुने हुए जनसेवक फैसले लेते हैं… फैसले, जनता के लिए। राजस्थान में शाही परिवार की बहू और मौजूदा मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया यही फर्क भूल गईं। और भूलीं भी कुछ यूं कि एक ऐसा बिल लाने की भूल कर गईं जिसको लेकर राजस्थान की सियासत में घमासान मचा है।
बिल पहले तो किसी भी जज, मजिस्ट्रेट या सरकारी कर्मचारी के जांच के दायरे में आने से बचाता है क्योंकि बिल के मुताबिक जांच के लिए सरकार की इजाज़त लेना ज़रुरी होगा। दूसरे ये कि बिल मीडिया की स्वतंत्रता पर भी हमला करता है क्योंकि मीडिया को भी भ्रष्टाचार और भ्रष्ट को सामने लाने की इजाज़त नहीं देता। इतना ही नहीं, नियम न मानने पर मीडियाकर्मी को जुर्माने और 2 साल की सज़ा का भी प्रावधान है।

हंगामा पुरजोर है लेकिन इस बिल को लेकर कुछ बातें समझना बहुत ज़रुरी है।

1.बिल को लाने का तर्क ही निराधार Continue reading “वसुंधरा सरकार के ‘गैरकानूनी’ कानून पर मोदी की चुप्पी और कांग्रेस के अनैतिक विरोध की वजह”

‘बीमार’ रवीश कुमार के नाम खुला खत

प्रिय रवीश जी,

बहुत दिनों से आपको चिट्ठी लिखने की सोच रहा था लेकिन हर बार कुछ न कुछ सोचकर रुक जाता था। सबसे बड़ी वजह तो ये थी कि मेरा इन ‘खुले खत’ में विश्वास ही नहीं रहा कभी। खासकर तब से जब सोशल मीडिया पर आपकी लिखी वो चिठ्ठी पढ़ ली थी जिसमें आपने अपने स्वर्गीय पिता को अपने शोहरत हासिल करने के किस्से बताए थे औऱ बताया था कि कैसे एयरपोर्ट से निकलते लोग आपको घेरकर फोटो खिंचवाने लग जाते हैं। बतौर युवा, जिसने 9 वर्ष की उम्र में अपने पिता को खो दिया था, मैं कभी उस खत का मकसद समझ ही नहीं पाया। मैं समझ हीं नहीं पाया कि वो चिट्ठी किसके लिए थी, उस पिता के लिए जो शायद ऊपर से आपको देख भी रहा था और आपकी तरक्की में अपने आशीर्वाद का योगदान भी दे रहा था या फिर उन लोगों के लिए जिन्हें ये बताने की कोशिश थी कि आई एम अ सिलेब्रिटी। क्योंकि मेरे लिए तो मेरे औऱ मेरे स्वर्गीय पिता का रिश्ता इतना निजी है कि मैं हमारी ख्याली बातचीत को सोशल मीडिया पर रखने का साहस कभी जुटा नहीं सकता।
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